रविवार, 21 अगस्त 2022

भारत के 10 सबसे रहस्यमय मंदिर



अगर आप हिंदू हैं और मंदिर जाना ठीक समझते हैं तो आपको यह विडियो देखना चाहिए। इस विडियो में भारत के ऐसे चुने हुए दस मंदिरों को दिखाया  गया है, जो न सिर्फ आस्था के केंद्र हैं, बल्कि कई रहस्यों को अपने में समेटे हुए हैं। आइए जानते हैं इन रहस्यमय मंदिरों का संक्षिप्त परिचय

   



1 स्तंभेश्वर महादेव मंदिर

कई पुराणों में इस तीर्थ स्थल के बारे में बताया गया है। महिसागर संगम तीर्थ की पावन भूमि पर भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय ने एक शिवलिंग को  स्थापित किया था, जिसे श्री स्तंभेश्वर महादेव कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से व्यक्ति सभी कष्टों से मुक्त हो जाता है और उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। यह स्तंभेश्वरतीर्थ गुजरात के भरूच जिला के जंबुसर तहसील में कावी-कंबोई समुद्र तट पर है। मंदिर की विशेषता यह है कि समुद्र दिन में दो बार श्री स्तंभेश्वर शिवलिंग का स्वयं अभिषेक करता है। समुद्र का पानी बढ़ने पर मंदिर पानी में डूब जाता है और थोड़ी ही देर में पानी उतर भी जाता है।


 2 करणी माता का मंदिर, 

 करणी माता का यह मंदिर बीकानेर (राजस्थान) में स्थित है। यह बहुत ही अनोखा मंदिर है। इस मंदिर में रहते हैं लगभग 20 हजार काले चूहे। लाखों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं। करणी देवी, जिन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है, के मंदिर को ‘चूहों वाला मंदिर’ भी कहा जाता है।

यहां चूहों को काबा कहते हैं और इन्हें बाकायदा भोजन कराया जाता है और इनकी सुरक्षा की जाती है। यहां इतने चूहे हैं कि आपको पांव घिसटाकर चलना पड़ेगा। अगर एक चूहा भी आपके पैरों के नीचे आ गया तो अपशकुन माना जाता है। कहा जाता है कि एक चूहा भी आपके पैर के ऊपर से होकर गुजर गया तो आप पर देवी की कृपा हो गई समझो और यदि आपने सफेद चूहा देख लिया तो आपकी मनोकामना पूर्ण हुई समझो।


3 पुरी का जगन्नाथ मंदिर

ओडिशा के नगर पुरी के तट पर भगवान जगन्नाथ का एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। यहां आज भी भक्‍तों की काफी भीड़ होती है। कहा जाता है कि इस मंदिर के कलश अथवा शिखर की छाया नहीं बनती है। इसके अलावा इस मंदिर के ऊपर लगा झंडा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। इसके अलावा इसके गुंबद के आसपास कोई पक्षी नहीं उड़ता है। काफी जांच पड़ताल के बावजूद भी इन रहस्‍यों का खुलासा नहीं हो सका है। यहीं नहीं इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का हृदय अब तक संभालकर रखा गया है। इससे हर साल मूर्ति बदलते वक्त नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है। यह काम करते वक्त पूरे शहर में लाइट को बंद कर दिया जाता है। यहां तक की इस कार्य को करने वाले पुजारी की आंखों में पट्टी बांध  दी जाती है। कहा जाता है कि अगर किसी ने उसे एक बार देख लिया तो वो जीवित नहीं बचता है। 


4 काल भैरव मंदिर

मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर से करीब 8 कि.मी. दूर कालभैरव मंदिर है। यहां भगवान कालभैरव को प्रसाद के तौर पर केवल शराब ही चढ़ाई जाती है। शराब से भरे प्याले कालभैरव की मूर्ति के मुंह से लगाने पर वह देखते ही देखते खाली हो जाते हैं। मंदिर के बाहर भगवान कालभैरव को चढ़ाने के लिए देसी शराब की कई दुकानें हैं।

पुराणों के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव का अपमान कर दिया था, इस बात से भगवान शिव बहुत क्रोधित हो गए और उनके नेत्रों से कालभैरव प्रकट हुए। क्रोधित कालभैरव ने भगवान ब्रह्मा का पांचवा सिर काट दिया था, जिसकी वजह से उन्हें ब्रह्म-हत्या का पाप लगा। इस पाप को दूर करने के लिए वह अनेक स्थानों पर गए, लेकिन उन्हें मुक्ति नहीं मिली। तब भैरव ने भगवान शिव की आराधना की। शिव ने भैरव को बताया कि उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर ओखर श्मशान के पास तपस्या करने से उन्हें इस पाप से मुक्ति मिलेगी। तभी से यहां काल भैरव की पूजा हो रही है। कालांतर में यहां एक बड़ा मंदिर बन गया। कहा जाता है मंदिर का निर्माण परमार वंश के राजाओं ने करवाया था।


5 कैलाश मानसरोवर : यहां साक्षात भगवान शिव विराजमान हैं। यह धरती का केंद्र है। दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित कैलाश मानसरोवर के पास ही कैलाश पर्वत और आगे मेरू पर्वत स्थित है। यह संपूर्ण क्षेत्र शिव और देवलोक कहा गया है। रहस्य और चमत्कार से परिपूर्ण इस स्थान की महिमा वेद और पुराणों में भरी पड़ी है।

कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22,068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है, जो चार धर्मों- तिब्बती धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू का आध्यात्मिक केंद्र है। कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज व करनाली।


6 ज्वाला देवी मंदिर… ज्वालादेवी का मंदिर हिमाचल के कांगड़ा घाटी के दक्षिण में 30 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मां सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां माता की जीभ गिरी थी। हजारों वर्षों से यहां स्थित देवी के मुख से अग्नि निकल रही है। इस मंदिर की खोज पांडवों ने की थी।

इस जगह का एक अन्य आकर्षण ताम्बे का पाइप भी है जिसमें से प्राकृतिक गैस का प्रवाह होता है। इस मंदिर में अलग अग्नि की अलग-अलग 9 लपटें हैं, जो अलग-अलग देवियों को समर्पित हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मृत ज्वालामुखी की अग्नि हो सकती है।

हजारों साल पुराने मां ज्वालादेवी के मंदिर में जो 9 ज्वालाएं प्रज्वलित हैं, वे 9 देवियों महाकाली, महालक्ष्मी, सरस्वती, अन्नपूर्णा, चंडी, विन्ध्यवासिनी, हिंगलाज भवानी, अम्बिका और अंजना देवी की ही स्वरूप हैं।

कहते हैं कि सतयुग में महाकाली के परम भक्त राजा भूमिचंद ने स्वप्न से प्रेरित होकर यह भव्य मंदिर बनवाया था। जो भी सच्चे मन से इस रहस्यमयी मंदिर के दर्शन के लिए आया है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।


7 कन्याकुमारी मंदिर : समुद्री तट पर ही कुमारी देवी का मंदिर है, जहां देवी पार्वती के कन्या रूप को पूजा जाता है। मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार देवी का विवाह संपन्न न हो पाने के कारण बच गए दाल-चावल बाद में कंकर बन गए। आश्चर्यजनक रूप से कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत में दाल और चावल के आकार और रंग-रूप के कंकर बड़ी मात्रा में देखे जा सकते हैं।


कन्याकुमारी अपने सूर्योदय के दृश्य के लिए काफी प्रसिद्ध है। सुबह हर होटल की छत पर पर्यटकों की भारी भीड़ सूरज की अगवानी के लिए जमा हो जाती है। शाम को अरब सागर में डूबते सूरज को देखना भी यादगार होता है। उत्तर की ओर करीब 2-3 किलोमीटर दूर एक सनसेट प्वॉइंट भी है।


8 राजराजेश्वरी मंदिर बिहार में


बिहार में यह मंदिर देवी देवी दुर्गा को समर्पित है। देवी दुर्गा ही नहीं इस मंदिर में और भी कई देवी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इस मंदिर में हर रात, किसी के बोलने की आवाज़ पड़ोस के लोगों द्वारा सुनी जाती है। इस मंदिर के आस-पास के लोगों का दावा है कि ये ध्वनियाँ एक-दूसरे के साथ बात करने वाली देवी देवताओं की आवाज़ हैं। अब तक किसी को भी रात में इस मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।


9 जगनाथार मंदिर उत्तर प्रदेश में


यह मंदिर कानपुर शहर में मौजूद है। इस मंदिर की वास्तुकला बहुत अलग है और स्थानीय लोगों द्वारा इसे मानसून मंदिर कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर एक छिद्र है। रहस्य यह है कि अगर पानी की बूंदें ज्यादा गिरती हैं तो अगले हफ्ते भारी बारिश या बाढ़ आ जाएगी। यदि पानी की बूंदें कम हो जाती हैं तो इस क्षेत्र में जल्द ही सूखा पड़ेगा।


10 कामाख्या मंदिर

पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में गुवाहाटी के पास स्थित कामाख्या देवी मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में सबसे प्रसिद्ध है। लेकिन इस अति प्राचीन मंदिर में देवी सती या मां दुर्गा की एक भी मूर्ति नहीं है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इस जगह देवी सती की योनि गिरी थी, जो समय के साथ महान शक्ति-साधना का केंद्र बनी। कहते हैं यहां हर किसी कामना सिद्ध होती है। यही कारण इस मंदिर को कामाख्या कहा जाता है।


शनिवार, 20 अगस्त 2022

आचार्य रावण ने करवाया था राम-सीता मिलन





 आचार्य रावण ने करवाया था राम-सीता मिलन 


जय श्रीकृष्णा

नमस्कार साथियों

थंबनेल देखकर ही आप लोगों को लग रहा होगा कि क्या उलटा पुलटा लिख दिया है। लेकिन दोस्तों यह सच है। और यह सच महर्षि कंबन की रामायण ‘इरामावतारम्’ में भी है। जिसे तमिल भाषा में लिखा गया है। तो आइए जानते हैं कि कैसे रावण भगवान राम पर इतना मेहरबान हुआ कि उसने युद्ध से पहले ही राम और सीता का मिलन करवाया था। हालांकि यह मिलन शर्तों के साथ कुछ क्षणों के लिए ही हुआ था, इसके बाद सीता जी को रावण वापस ले गया था। बाद में  भगवान राम ने युद्ध में उसे मारकर सीता जी को मुक्त करवाया था। आइए जानते हैं िवस्तार से



बाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण , ॠषि विश्वश्रवा का पुत्र एवं पुलस्त्य मुनि का पोता था । रावण की मां कैकेसी थी जो कि ऋषि विश्वश्रवा की दूसरी पत्नी थी। उनकी पहली पत्नी इलाविडा थीं, जो कुबेर की मां थी। यानि रावण और कुबेर आपस में भाई थे।  कैकेसी राक्षस कुल की थी इसलिए इसलिए रावण आधा ब्राहम्ण और आधा रााक्षस कुल का था। 


जब भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए सेतु का निर्माण कर लिया। तब उन्होंने युद्ध शुरू करने से पहले वहां पर रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना करनी चाही। इसके लिए उन्होंने  यज्ञ करने का संकल्प लिया। इसके लिए उन्होंने जामवंतजी से कहा कि आस-पास से कोई पुरोहित, पुजारी या फिर कोई भी आचार्य ढूढ़कर लाइए जो इस यज्ञ को संपन्न करवा सके। इस पर जामवंतजी बोले, ‘हे प्रभु यहां जंगल में समुद्र तट पर पेड़ पौधे वन्‍यजीव के अलावा क्‍या मिलेगा?’ इस पर श्रीराम बोले कि आचार्य ऐसा होना चाहिए जो शैव और वैष्‍णव दोनों परंपराओं का ज्ञाता हो। इस पर जामवंतजी ने कहा कि ऐसा तो केवल एक ही व्‍यक्ति है, लेकिन वह हमारा शत्रु है। पुलत्‍स्‍य मुनि का नाती है, वैष्‍णव है, शिव भक्‍त है और दोनों परंपराओं को जानता है। राम ने कहा कि ठीक है आप बात करें और यज्ञ का निमंत्रण दें।

जामवंतजी पहुंचे लंका

श्रीराम की आज्ञा पाकर जामवंतजी लंका पहुंचे, क्‍योंकि रावण ही वह व्‍यक्ति था, जिसमें ये सारी खूबियां थीं। जब रावण को पता लगा कि जामवंतजी लंका आए हैं तो वह काफी उत्‍सुक हो गया। दरअसल जामवंतजी रावण के दादा के मित्र थे, इसलिए रावण उनका सम्‍मान करता था। उसने यह आदेश दे दिया कि महल तक आने में उन्‍हें तकलीफ न हो। इसलिए जगह-जगह राक्षस खड़े होकर उन्‍हें रास्ता बताते रहें। ऐसा ही हुआ और जामवंतीजी रावण के पास पहुंच गए।


रावण ने जामवंत से पूछा यह प्रश्‍न

रावण ने जामवंतजी को दंडवत प्रणाम करते हुए उन्हें बैठने का आसन दिया और फिर उनसे लंका आने का आशय पूछा। जामवंतजी ने बताया, ‘मेरे यजमान को अपने विशेष कार्यसिद्धि के लिए यज्ञ करना है और उसके लिए आपको पुरोहित के तौर पर आमंत्रण देने आया हूं।’ फिर रावण ने पूछा कि आपके यजमान कौन हैं तो जामवंत ने कहा कि वह अयोध्‍या के राजकुमार और महाराज दशरथ के पुत्र श्रीराम हैं और अपने एक बड़े काम के लिए शिवलिंग स्‍थापित करना चाहते हैं, इसके लिए उन्‍हें एक यज्ञ करना है। रावण ने पूछा कि क्‍या यह बड़ा काम लंका विजय तो नहीं है? जामवंतजी ने कहा कि हां यही काम है।

रावण प्रतिभाशाली था, वो समझ गया कि आज तक मुझे किसी ने आचार्य का पद नहीं दिया। और आज स्वयं उनके पितामह के मित्र जामवंत आकर उन्हें श्रीराम का आचार्य बनने का निमंत्रण दे रहे हैं। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा, इसलिए उसने अपने आधे ब्राह्मण होने का गुण और संसकार का परिचय देते हुए  यज्ञ में आने की हामी भर दी।


फिर रावण ने किया यह काम

रावण द्वारा न्‍यौता स्‍वीकार करने के बाद जामवंतजी ने पूछा कि यज्ञ के लिए क्‍या-क्‍या सामग्री चाहिए, इसके बारे में आप मुझे बता दें। इस पर रावण बोला कि जब यजमान वनवासी हो तो शास्‍त्रों के अनुसार यह पुरोहित का कर्तव्‍य है कि वह सभी सामान की व्‍यवस्‍था करे तो आप चिंता न करें, मैं सब सामान अपने साथ लेकर आऊंगा। बस आप मेरे यजमान को बोल दीजिएगा कि वह स्‍नान करके व्रत के साथ यज्ञ में बैठ जाएं। चूंकि शास्‍त्रों में यज्ञ अर्द्धांगिनी के बिना पूर्ण नहीं माना जाता, इसलिए रावण सीता के पास भी गया।


सीता को बोली यह बात

रावण ने अशोक वाटिका में पहुंचकर सीता को बताया कि तुम्‍हारे पति राम लंका पर विजय के लिए यज्ञ करना चाहते हैं और पुरोहित मुझे चुना है तो यज्ञ की सारी व्‍यवस्‍था के साथ उनकी अर्द्धांगिनी को भी उपलब्‍ध करवान मेरा कर्तव्‍य है। इसलिए तुम इस पुष्‍पक विमान में बैठ जाओ। लेकिन ध्‍यान रखना कि वहां भी तुम मेरी कैद में ही रहोगी। यह सुनकर देवी सीता ने रावण को आचार्य मानकर प्रणाम किया और बोला कि जो मेरे स्‍वामी के आचार्य हैं वह मेरे भी आचार्य हुए। रावण ने भी सीता को अखंड सौभाग्‍यवती भव का आशीर्वाद दिया।


रावण सीता को लेकर पहुंचा यज्ञ करवाने

उसके बाद रावण आचार्य के तौर पर देवी सीता को लेकर यज्ञ करवाने के लिए पहुंच गए। फिर हनुमानजी को पूजा के लिए शिवलिंग लाने को भेजा गया। पूजा में देर होने लगी तो आचार्य रावण ने कहा कि और विलंब नहीं किया जा सकता। फिर देवी सीता ने विलंब किए बिना समुद्र तट पर अपने हाथ से ही मिट्टी का शिवलिंग बना दिया और उसकी ही स्‍थापना कर दी गई, जो कि आज भी भगवान शिव के 11 ज्‍योर्तिलिंगों में से एक है। फिर कुछ देर बाद हनुमानजी भी अपना शिवलिंग लेकर आ गए तो राम ने कहा कि अब तो शिवलिंग की स्‍थापना हो चुकी। तब भी हनुमान नहीं माने तो राम ने कहा, आप इस शिवलिंग को हटाकर अपना वाला शिवलिंग यहां रख दें। लेकिन हनुमानजी उस शिवलिंग को नहीं हिला सके तो उनका वाला शिवलिंग भी वहीं पास में ही स्‍थापित कर दिया गया। आज भी हनुमानजी द्वारा स्‍थापित शिवलिंग वहां स्थित है, जिसे हनुमानेश्‍वर के नाम से जाना जाता है।


रावण ने मांगी यह दक्षिणा

यज्ञ संपन्‍न होने के बाद राम और सीता ने आचार्य रावण को प्रणाम किया और दक्षिणाा मांगने को कहा। रावण ने कहा कि आप वनवासी हैं तो मैं आपसे दक्षिणा नहीं ले सकता। मेरी दक्षिणा आप पर उधार रही। राम ने कहा कि आचार्य आप अपनी दक्षिणा बता दें ताकि समय आने पर हम देने के लिए तैयार रहें। रावण ने दक्षिणा के रूप में कहा कि जब मेरा अंतिम समय आए तो मेरा यजमान मेरे सामने रहे। यह कहकर रावण देवी सीता को अपने साथ वापस पुष्‍पक विमान में लेकर चला गया



शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े दस रोचक तथ्य



https://youtu.be/x9UTMWh80H4


1 श्रीकृष्ण पांडव के ननिहाल पक्ष से आते हैं।  पांडवों की माता कुंती, वासुदेव की बहन थीं, जो श्री कृष्ण के पिता थे।


2 श्रीकृष्ण इतने शक्तिशाली हैं कि उन्होंने अपने गुरु संदीपनी के मरे हुए पुत्र को जीवित कर अपने गुरु को गुरुदक्षिणा के रूप में दिया।


 3 श्रीकृष्ण ने देवकी के छह पुत्रों को भी पुनर्जीवित किया। देवकी के यह छह पुत्र पिछले जन्म में कालनेमि के पुत्र थे, और उन्हें हिरण्यकश्यप ने श्राप दिया था कि वे अपने पिता के कारण मर जाएंगे। अगले जन्म में कंस ने देवकी के छह पुत्रों को मार डाला। उनके नाम थे हम्सा, सुविक्रम, कृत, दमन, रिपुमर्दन, और क्रोधादहन।


4 जब दुर्वासा श्री कृष्ण की उपस्थिति में खीर खा रहे थे, तो उन्होंने श्री कृष्ण को आदेश दिया की वह अपने शरीर के बाए भाग पर खीर लगाए। कृष्ण इसे अपने शरीर पर लगाने के लिए सहमत हुए, लेकिन उन्होंने यह सोचकर अपने पैरों पर इसे लागू नहीं किया, कि खीर अपनी पवित्रता खो देगी। इस पर दुर्वासा ने नाराज होकर उन्हें श्राप दे दिया कि कृष्ण ने मेरे आदेशों का पालन नहीं किया, इसीलिए उनके पैर अभेद्य और अखंड होने की गुणवत्ता खो देंगे। इसी तरह यह अभिशाप कृष्ण के अंत का कारण बन गया जब एक शिकारी ने एक तीर से कृष्ण जी के पैर को चोट पहुंचाई, और वह दुनिया से चले गए। 


5 महाभारत के समय उनकी आयु ७२ वर्ष बताई गयी है। महाभारत के पश्चात पांडवों ने ३६ वर्ष शासन किया और श्रीकृष्ण की मृत्यु के तुरंत बाद ही उन्होंने भी अपने शरीर का त्याग कर दिया। इस गणना से श्रीकृष्ण की आयु उनकी मृत्यु के समय लगभग १०८ वर्ष थी। ये संख्या हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र मानी जाती है। यही नहीं, परगमन के समय ना श्रीकृष्ण का एक भी बाल श्वेत था और ना ही शरीर पर कोई झुर्री थी।



 6 पहले अवतार में, भगवान राम ने बाली को मार डाला, और उन्होंने तारा (बाली की विधवा) को आश्वासन दिया कि बाली अपने अगले जन्म में बदला लेने में सक्षम होगा। बाली को ही जारा के रूप में पुनर्जन्म दिया गया था, और उसने एक सरल तीर के साथ पृथ्वी पर श्री कृष्ण का जीवन समाप्त कर दिया। यह गांधारी का श्राप था।


7 भगवान् कृष्ण की 16,108 रानियां थी, जिनमें से आठ राजपूत पत्नियाँ थीं, जिन्हें पटरानी या अष्टभैरव के नाम से जाना जाता था। अन्य 16,100 पत्नियाँ वे थीं जिन्हें श्रीकृष्ण ने भयंकर असुर नरकासुर के चंगुल से बचाया था। जब राक्षस नरकासुर ने अविवाहित लड़कियों को पकड़ लिया था कर वह उनके साथ नाजायज सम्बन्ध बनाता था तब श्रीकृष्ण ने उन लड़कियों को उसके चंगुल से बचाया था। समाज व् स्वयं उनका परिवार वालो ने उन्हें स्वीकार करने से मन कर दिया था, तब भगवान् कृष्ण ने उन्हें अपनी पत्नियों के रूप में जगह दी थी।


 8 श्रीकृष्ण के 80 बेटे थे जो आठ रानियों से पैदा हुए थे, प्रत्येक रानी ने 10 बेटों को जन्म दिया। उनमें से सबसे प्रसिद्ध थे। प्रद्युम्न, जो रुक्मिणी के पुत्र के रूप में थे; जांबवती का पुत्र सांब जो ऋषियों द्वारा शापित हो गया था और यही कारण था कि यदु वंश नष्ट हो गया। श्री कृष्ण ने भगवान शिव की तपस्या की थी ताकि उन्हें भगवान शिव जैसा पुत्र प्रापत हो।


 9 सुभद्रा, कृष्ण की बहन, वासुदेव और रोहिणी की बेटी थी और जब वासुदेव को जेल से मुक्त किया गया था तब उनका जन्म हुआ था। बलराम चाहते थे कि उनकी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से हो, जो उनके पसंदीदा शिष्य थे। हालांकि, उनकी बहन, और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी बलराम का विरोध किया गया था। भगवान् कृष्ण जानते थे के अर्जुन और सुभद्रा एक दूसरे से प्यार करते है। इसीलिए कृष्ण ने अर्जुन को सुभद्रा का अपहरण करने की सलाह दी, और सुभद्रा ने अर्जुन से इंद्रप्रस्थ में शादी कर ली।


10 शास्त्रों में कहीं भी राधा का उल्लेख नहीं किया गया है। इसका उल्लेख महाभारत या श्रीमद्भागवतम् में भी नहीं है। व्यास जी की पुस्तके पढ़ने वाला हर एक व्यक्ति चाहता है के राधा का जिक्र हो लेकिन उनके किसी भी शास्त्र में राधा का उल्लेख नहीं किया गया। इस बात को जयदेव ने अपनी पुस्तकों में शामिल किया और फिर वहीं से कृष्ण और राधा के बारे में लोगो को जानने को मिला।


 11 एकलव्य, वासुदेव के भाई देवश्रवा का पुत्र था। वह भगवान् कृष्ण के चचेरा भाई थे। एक दिन, वह जंगल में खो गया, और बाद में निशाडा हिरण्यधनु से मिला। वह अपने पिता की रक्षा करते हुए मर गया,उस दौरान रुक्मिणी अपने स्वयंवर में थी और कृष्ण ही थे


मंगलवार, 16 अगस्त 2022

ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में क्या अंतर है?

 जय श्री कृष्णा

नमस्कार साथियों 



आप देख रहे हैं कालचक्र। आज हम बात करेंगे कि ऋषि, मुनि, साधु, संत और संन्यासी के बीच के अंतर पर। क्योंकि यह सभी अलग-अलग है। लेकिन ज्यादातर लोग इनका अर्थ एक ही समझते हैं। जबकि यह एक तरह से वैदिक काल की डिग्रियों जैसा है। जैसे की आजकल डिप्लोमा और डिग्री होती है। आइए जानते हैं कि यह एक दूसरे से किस तरह से भिन्न हैं। 


भारत में प्राचीन समय से ही ऋषि-मुनियों का विशेष महत्व रहा है। क्योंकि ये समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे। ऋषि-मुनि अपने ज्ञान और तप के बल पर समाज कल्याण का कार्य करते थे और लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाते थे। आज भी तीर्थ स्थल, जंगल और पहाड़ों में कई साधु-संत देखने को मिल जाते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि साधु, संत, ऋषि, महर्षि आदि यह सब अलग-अलग होते हैं। क्योंकि ज्यादातर लोग इनका अर्थ एक ही समझते हैं। आइए जानते हैं कि ऋषि, महर्षि, मुनि, साधु, संत और संत में क्या अंतर है और उनके बारे में क्या मान्यताएं हैं…।


ऋषि

'ऋषि' वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है। ऋषि वो लोग कहलाए जिन्होंने पूर्व में बोले गए ग्रंथों को लिपिबद्ध किया। इन ग्रंथों को श्रुति ग्रंथ कहा जाता है। क्योंकि यह ज्यादातर ग्रंथ भगवान के बोले हुए हैं। जिन्हें गुरु शिष्य की परंपरा में कई पीढ़ियों तक सिर्फ सुना गया था। इसके बाद कुछ विशेष बुद्धि वाले लोग आए और उन सुने हुए ग्रंथों का अध्ययन कर समझा। इतना ज्यादा गहराई से समझा  कि वो चीजे उनके मन के अंदर रीक्रिएट हुई। इस पर उन्होंने समाज के कल्याण के लिए उसे कागजों पर उतारा।

'ऋषि' वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है। जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है।  ऐसे व्यक्ति जिन्होंने अपनी विशिष्ट और विलक्षण एकाग्र शक्ति के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किया और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किया 'ऋषि' कहलाये। ऋषि को सैकड़ों सालों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। वैदिक काल में सभी ऋषि गृहस्थ आश्रम से आते थे। ऋषि पर किसी तरह का क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और ईर्ष्या आदि की कोई रोकटोक नहीं है और ना ही किसी भी तरह का संयम का उल्लेख मिलता है। ऋषि अपने योग के माध्यम से परमात्मा को प्राप्त हो जाते थे और अपने सभी शिष्यों को आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ-साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम थे। हमारे पुराणों में सप्त ऋषि का उल्लेख मिलता है, जो केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु हैं।

'ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार 

अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। यद्यपि वैदिक ऋचाओं के रचयिताओं को ही ऋषि का दर्जा प्राप्त है।


महर्षि

ऋषि से भी ज्यादा जानकार लोग महर्षि कहलाए। ज्ञान और तप की उच्चतम सीमा पर पहुंचने वाले व्यक्ति को महर्षि कहा जाता है। इनसे ऊपर केवल ब्रह्मर्षि माने जाते हैं। हम सभी में तीन प्रकार के चक्षु होते हैं। ज्ञान चक्षु, दिव्य चक्षु और परम चक्षु। जिसका ज्ञान चक्षु जाग्रत हो जाता है, उसे ऋषि कहते हैं। जिसका दिव्य चक्षु जाग्रत होता है उसे महर्षि कहते हैं और जिसका परम चक्षु जाग्रत हो जाता है उसे ब्रह्मर्षि कहते हैं। इस कड़ी में अंतिम महर्षि का दर्जा दयानंद सरस्वती को प्राप्त है। जिन्होंने मूल मंत्रों को समझा और उनकी व्याख्या की। इसके बाद आज तक कोई व्यक्ति महर्षि नहीं हुआ। महर्षि मोह-माया से विरक्त होते हैं और परामात्मा को समर्पित हो जाते हैं।


मुनि

मुनि शब्द का अर्थ होता है मौन अर्थात शांति यानि जो मुनि होते हैं, वह बहुत कम बोलते हैं। मुनि मौन रखने की शपथ लेते हैं और वेदों और ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जो ऋषि साधना प्राप्त करते थे और मौन रहते थे उनको मुनि का दर्जा प्राप्त होता था। कुछ ऐसे ऋषियों को मुनि का दर्जा प्राप्त था, जो ईश्वर का जप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे, जैसे कि नारद मुनि। मुनि मंत्रों को जपते हैं और अपने ज्ञान से एक व्यापक भंडार की उत्पत्ति करते हैं। मुनि शास्त्रों की रचना करते हैं और समाज के कल्याण के लिए रास्ता दिखाते हैं। मौन साधना के साथ-साथ जो व्यक्ति एक बार भोजन करता हो और 28 गुणों से युक्त हो, वह व्यक्ति ही मुनि कहलाता था।  मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता के अनुसार "जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निश्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं। 


साधु

साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। साधु होने के लिए विद्वान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि साधना कोई भी कर सकता है। प्राचीन समय में कई व्यक्ति समाज से हटकर या समाज में रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उससे विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण यह है कि साधना से व्यक्ति सीधा, सरल और सकारात्मक सोच रखने वाला हो जाता है। साथ ही वह लोगों की मदद करने के लिए हमेशा आगे रहता है। साथु का संस्कृत में अर्थ है सज्जन व्यक्ति । लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है


सन्यासी 

'सन्यास' से 'सन्यासी' शब्द की उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ त्याग करना होता है। सब कुछ त्याग करने वाले व्यक्ति को ही सन्न्यासी कहते हैं। संपत्ति , गृहस्थ जीवन , सांसारिक जीवन और समाज का त्याग करने वाला व्यक्ति 'सन्यासी' होता है। वह अपना सम्पूर्ण जीवन परहित और परोपकार के कार्यों में लगा देता है। ध्यान योग द्वारा अपने आराध्य की भक्ति में ही लीन रहता है।


संत

संत उस व्यक्ति को कहते हैं, जो सत्य का आचरण करता है और आत्मज्ञानी होता है। जैसे- संत कबीरदास, संत तुलसीदास, संत रविदास। ईश्वर के भक्त या धार्मिक पुरुष को भी संत कहते हैं। बहुत से साधु, महात्मा संत नहीं बन सकते क्योंकि घर-परिवार को त्यागकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए चले जाते हैं। जो व्यक्ति संसार और अध्यात्म के बीच संतुलन बना लेता है, उसे संत कहते हैं। संत के अंदर सहजता शांत स्वभाव में ही बसती है। संत होना गुण भी है और योग्यता भी।


उम्मीद करते हैं दोस्तों यह विडियो आपको अच्छा लगा होगा और आप कुछ नया जाने हांेगे। अगर आपके मन में  इस टॉपिक से जुड़ा कोई सवाल  हो तो आप कमेंट कर पूछ सकते हैं, हम उसका उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे। 

जल्द मिलेंगे इस तरह के ही एक नए टॉपकि के साथ एक नए विडियो में 

तब तक के लिए नमस्कार, देखते रहिए कालचक्र 

सोमवार, 15 अगस्त 2022

अर्जुन और कर्ण की बजाय एकलव्य को क्यों तीरंदाजी का जनक कहा गया है

 


दोस्तों , क्या आप जानते हैं कि आधुनिक तीरंदाजी का जनक एकलव्य को माना जाता है। जबकि हम शुरू से सुनते आए हैं कि महाभारत में अर्जुन को सबसे बड़ा धर्नुरधर कहा गया है। इसके बावजूद आज के जमाने में जो तीरंदाजी प्रतियोगिताएं होती हैं, उसमें कोई भी खिलाड़ी अर्जुन की तरह बाण चलाना तो दूर पकड़ता तक नहीं है। आज तीरंदाजी के सभी खिलाड़ियों के तीर चलाने का पैटर्न महाभारत काल के एक धुर्नरधर एकलव्य जैसा है। यह सभी खिलाड़ी तीर को पकड़ने और चलाने के लिए अंगूठे का इस्तेमाल नहीं करते हैं। शायद यही एकलव्य की निशानी हमारे बीच बची है। 

आइए जानते हैं एकलव्य ने कैसे सीखी थी यह धर्नुविद्या

महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य धर्नुविद्या के सबसे बड़े ज्ञाता थे, क्योंकि उन्होंने यह विद्या सीधे परशुराम से सीखी थी। जब यह बात एकलव्य को पता चली तो वो गुरु द्रोणाचार्य के पास आया और काफी विनती की वो उसे धर्नुविद्या सिखाएं, लेकिन  गुरु द्रोणाचार्य ने उसे शिक्षा देने से साफ मना कर दिया था। क्योंेकि वो जानते थे कि भविष्य में यह जरासंध जैसे पापियों का साथ देगा। इसलिए उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वो इस समय राजगुरु है इसलिए वो सिर्फ राजा के पुत्रों को ही शिक्षा दे सकते हैं। अन्य किसी को नहीं। 

 फिर भी उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुए अल्पकाल में ही एकलव्य धनुर्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया। एक दिन पाण्डव तथा कौरव राजकुमार गुरु द्रोण के साथ शिकार के लिए उसी वन में गए, जहां पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुंचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी। इसलिए उसने अपने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। 

 एकलव्य ने इस ढंग से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी। जबकि कुत्ते का पूरा मुंह बाणों से भर गया था। इससे वो भौंक नहीं पा रहा था। कुत्ते के लौटने पर कौरव, पांडव तथा स्वयं द्रोणाचार्य यह धनुर्कौशल देखकर दंग रह गए और बाण चलाने वाले की खोज करते हुए एकलव्य के पास पहुंचे। उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि द्रोणाचार्य को मानस गुरु मानकर एकलव्य ने स्वयं ही अभ्यास से यह विद्या प्राप्त की है। कथा के अनुसार एकलव्य ने गुरुदक्षिणा के रूप में अपना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्य को दे दिया था। हालांकि इसका एक सांकेतिक अर्थ यह भी है कि एकलव्य को अतिमेधावी जानकर द्रोणाचार्य ने उसे बिना अँगूठे के धनुष चलाने की विशेष विद्या का दान दिया हो।  कहा जाता हैं कि अंगूठा कट जाने के बाद एकलव्य ने तर्जनी और मध्यमा अंगुली का प्रयोग कर तीर चलाने लगा। यहीं से तीरंदाजी करने के आधुनिक तरीके का जन्म हुआ। निःसन्देह यह बेहतर तरीका है और आजकल तीरंदाजी इसी तरह से होती है। वर्तमान काल में कोई भी व्यक्ति उस तरह से तीरंदाजी नहीं करता जैसा कि अर्जुन करता था।


एकलव्य को भगवान कृष्ण ने क्यों मारा था




 प्रयाग के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य निषादराज हिरण्यधनु का था। एकलव्य हिरण्य धनु निषाद का पुत्र था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। हिरण्यधनु के मृत्यु के बाद एकलव्य वहां का राजा बना। विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार एकलव्य अपनी विस्तारवादी सोच के चलते जरासंध से जा मिला था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण करके यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। 

यादव सेना के सफाया होने के बाद यह सूचना जब श्रीकृष्‍ण के पास पहुंचती है तो वे भी एकलव्य को देखने को उत्सुक हो जाते हैं। दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखकर वे समझ जाते हैं कि यह पांडवों और उनकी सेना के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। तब श्रीकृष्‍ण का एकलव्य से युद्ध होता है और इस युद्ध में एकलव्य वीरगति को प्राप्त होता है। यह भी कहा जाता है कि युद्ध के दौरान एकलव्य लापता हो गया था। अर्थात उसकी मृत्यु बाद में कैसे हुई इसका किसी को पता नहीं है।

एकलव्य के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है। श्री कृष्ण ने एकलव्य का वध इसीलिए किया क्यूंकि वो अधर्म का साथ दे रहा था। अधर्मी राजा जरासंध की तरफ से युद्ध कर रहा था। और श्री कृष्ण का तो धरती पर अवतरित होने का कारण ही अधर्म को मिटाना था इसीलिए उन्होंने वही किया।

शनिवार, 13 अगस्त 2022

संभोग के समय जनेऊ उतारना चाहिए या पहने रहना चाहिए

जय श्री कृष्णा


सभी साथियों को नमस्कार


आप देख रहे हैं कालचक्र  


  आज हम जानेंगे जनेऊ से जुड़े कुछ ऐसे सवाल जिनको लेकर लोगों के मन में संशय रहता है। इसके अलावा जनेऊ को पहनने के वैज्ञानिक दृष्टि से क्या लाभ हैं।  जनेऊ हमें क्यों पहनाना चाहिए। सहवास करते समय जनेऊ को उतारना ठीक है या पहने रहना है। इन सभी सवालों के जवाब आपको यह विडियो देखने के बाद मिल जाएंगे। तो देखते रहिये कालचक्र


साथियों,

 

आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में 'यज्ञोपवीत' कहा जाता है। 

इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन धागे देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं । यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर कुल नौ होते हैं।

पांच गांठ : इसके अलावा में जनेउ में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है। प्रत्येक आर्य जनेऊ पहन सकता है, बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।


जनेऊ पहनने का लाभ


जीवाणु और बैक्टीरिया से बचाव : जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं वह मल मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणु और बैक्टीरिया ओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

गुर्दे की सुरक्षा जनेऊ पहनने वाले बैठकर ही जलपान करना करते हैं। अर्थात खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए। और बैठकर ही मूत्र त्याग करते हैं। इससे किडनी पर प्रेशर नहीं पड़ता।

हृदय रोग और ब्लड प्रेशर से बचाव : शोध के अनुसार मेडिकल साइंस ने भी यह पाया है कि जनेऊ पहनने वाले लोगों को हृदय रोग और ब्लड प्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है शरीर के खून में प्रभाव को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है।

लकवे से बचाव: जनेऊ पहनने से लकवे की संभावना भी कम हो जाती है। क्योंकि जनेऊ धारण करने वाले को लघु शंका व मल त्याग करते समय दांत पर दांत रख कर बैठना चाहिए, ऐसा करने से आदमी को लकवा नहीं मारता।


कब्ज से बचाव :जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों का भी दबाव पड़ता है। जिनका संबंध सीधे आंतों से होता है। इस कारण कब्ज की शिकायत नहीं होती है।

स्मरण शक्ति की रक्षा : कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्ति सही बनी रहती है। क्योंकि कान पर जनेऊ लपेटने से कान पर दबाव पड़ता है जिससे दिमाग की नसें एक्टिव हो जाती हैं।

बुरी आत्माओं से रक्षा : ऐसा मानना है कि जनेऊ पहनने वाले के पास बुरी आत्माएं नहीं भटकती, इसका कारण यह है कि जनेऊ धारण करने वाला खुद पवित्र आत्मरूप बन जाता है, और उसमें आध्यात्मिक ऊर्जा का विकास होता है।


हमारे ग्रंथो में ब्रह्मचर्य के नियम में जनेऊ पहनना अनिवार्य माना गया है। ब्राह्मण के दाहिने कान में वायु, चंद्रमा, मित्र, आदित्य, वरुण,अग्नि आदि देवताओं का वास होता है। इसीलिए इसे दाहिने कान पर मलमूत्र त्याग के समय कान पर चढ़ाया जाता है ताकि अशुद्ध न हो।

अब आते हैं आपके सवाल के जवाब की ओर सहवास के समय जनेऊ धारण करना चाहिए या नही?

सहवास के समय जनेऊ पहनना अनिवार्य माना गया है जैसे आप पहनते हो वैसे ही सहवास के समय धारण किए रहना चाहिए।

अगर जनेऊ खुद से निकल जाता है तो नया जनेऊ धारण कर सकते लेकिन सहवास के समय आप खुद से जनेऊ को नहीं निकल सकते वरना जो भी जनेऊ की पवित्रता है वो समाप्त हों जाएगी। 


शारीरिक सम्बन्ध बनाते समय जनेऊ धारण किये रहना चाहिये अपितु उसे अपने गले में या कान में लपेट लेना चाहिये। जनेऊ का योनी या लिङ्ग से स्पर्श न हो इसका ध्यान रखा जाना चाहिये। जनेऊ को योनीस्राव या वीर्य या मल-मूत्र आदि न लग जाये इसका ध्यान रखा जाना चाहिये। यही कारण है कि लघुशंका या मलविसर्जन के समय जनेऊ को कान में लपेटा जाता है और हाथ पांव धोने के पश्चात् ही कान से निकाला जाता है।

 पत्नी के साथ सहवास गृहस्थ के लिए धर्म है। इसलिए इसे कार्य को करते वक्त जनेऊ को उतारने की आवशयकता नहीं है। बशर्तें कि वो अशुद्ध न हो। इसका ध्यान रखना है, अशुद्ध होने पर जनेऊ को तुरंत बदल देना चाहिए। 



ऐसे करें प्रार्थना तो पूरी होगी कामना





जय श्री कृष्णा

सभी साथियों को नमस्कार

आप देख रहे हैं कालचक्र  

  आज हम बात करंेगे प्रार्थना करने के सही तरीकों पर। अगर आप इन तरीकों को अपनाते हैं तो यकीन मानिए आपकी प्रार्थना चाहे धन की हो या संतान की या फिर नौकरी की जरूर पूरी होगी। आइए जानते हैं ऐसे कौन से तरीके हैं जिनसे प्रार्थना आपके ईष्ट तक आसानी से पहुंच जाती है।


साथियों,  प्रार्थना में वाकई बहुत शक्ति होती है अगर आप इसके जरिए अपनी मनोकामना की पूर्ति चाहते हैं तो जरूरी है कि प्रार्थना को सही तरीके से किया जाए। हम अपनी मेहनत और दिमाग से काबिल तो बन जाते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ मौकों पर हमारी काबिलियत भी हमारे काम नहीं आ पाती।

ये ऐसे मौके होते हैं जब कुछ घटनाओं पर हमारा जोर नहीं चलता। इसी को हम अपनी जुबान में बुरा दौर कहते हैं और इंसान की फितरत ही ऐसी है कि बुरे दौर में ही उसे ईश्वर की याद आती है।  तब मनुष्य उनकी शरण में जाकर उनसे अपनी मनोकामना की प्रार्थना करने लगता है। 

अगर आप चाहते हैं कि आप की पुकार भगवान तक पहुंचे तो आपको प्रार्थना करने के सही तरीके के बारे में पता होना चाहिए।

 ईश्वर से अपने दिल की बात कहना ही प्रार्थना है। प्रार्थना से व्यक्ति अपने या दूसरों की इच्छा पूर्ति का प्रयास करता है। वैसे तंत्र मंत्र ध्यान और जाप भी प्रार्थना का ही एक रूप है।


 प्रार्थना से प्रकृति में आप के अनुरूप बदलाव होते हैं। कोई प्रार्थना एक साथ कई लोग करें तो वह ज्यादा प्रभावित हो जाती है एक साथ प्रार्थना करने पर प्रकृति में तेजी से बदलाव होता है। 


प्रार्थना अनसुनी क्यों हो जाती है

 इंसान को कभी कभी लगता है कि वह ईश्वर से प्रार्थना तो खूब कर रहा है, लेकिन यह सुनी नहीं जा रही है अगर आप भी इस स्थिति में हैं तो हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों कभी-कभी प्रार्थनाएं नाकाम हो जाती हैं। प्रार्थना के नाकाम होने की कुछ वजह हैं 

जैसे आहार और व्यवहार पर नियंत्रण न रखने से प्रार्थना नाकाम होती है। माता-पिता का सम्मान न करने से प्रार्थना असफल होती है। प्रार्थना से आपका ही नुकसान हो रहा हो तो भी प्रार्थना नाकाम हो जाती है अतार्किक प्रार्थना भी असफल हो जाती है 


प्रार्थना के नियम 



सही तरीके से की गई प्रार्थना जीवन में चमत्कारी बदलाव लाती है।

 प्रार्थना सरल और साफ तरीके से की जानी चाहिए 

आसानी से बोली जाने वाली प्रार्थना करनी चाहिए 

शांत वातावरण में प्रार्थना करना सबसे बढ़िया होता है।

 खासतौर पर मध्य रात्रि में प्रार्थना जल्दी स्वीकार हो जाती है। 

 प्रार्थना को रोज एक ही समय पर करना अच्छा होता है।

 दूसरे के नुकसान के उद्देश्य से अतार्किक प्रार्थना न करें

दूसरे के लिए प्रार्थना करने से पहले उसके बारे में सोचें और फिर प्रार्थना शुरू करें।


एसे करें प्रार्थना 

 सबसे पहले एकांत स्थान में बैठे।

 अपनी रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखें।

अब अपने ईष्ट, गुरु, ईश्वर का ध्यान करें।

ईश्वर ने अब तक जो आपको दिया है, पहले उसके लिए उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें

उसके बाद जो प्रार्थना करनी है उसे करें। 

अपनी प्रार्थना को अपने तक ही रखें जब भी मौका मिले अपनी प्रार्थना दोहराते रहें। 

अगर आपने इन तरीकों से सच्चे मन से प्रार्थना की तो यकीनन आपकी मनोकामना पूरी होगी

रविवार, 31 जुलाई 2022

नया घर बनवा रहे हैं तो इस बात का विशेष ध्यान रखें

आजकल लोग नए-नए तरीके से ऑर्किटेक्ट और इंजीनियर की मदद से अपने सपनों का आशियाना बनवाते हैं। इसमें लाखों रुपये भी खर्च कर देते हैं, लेकिन एक जरूरी स्टेप, जो भविष्य में पूरे मकान और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा से जुड़ा उसपर ध्यान नहीं देते हैं। जिसके कारण लोगों का हजारों रुपये का नुकसान पलभर में हो जाता है और तो और कई बार तो वहां रहने वाले लोगों की जान पर बन आता है। जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं, ग्राउंड अर्थिंग की।  ग्राउंड अर्थिंग क्या है, हमें इसे क्यों करवाना चाहिए, इसको न करवाने से क्या नुकसान हो सकता है। और इसको करवाने से क्या फायदा हो सकता है। इन सभी मुद्दों पर आज हम चर्चा करेंगे। तो चलिए शुरू करते हैं। 



ग्रउंड अर्थ को समझने से पहले हमें फेज और न्यूट्रल के बारे में समझना होगा। कहीं पर भी बिजली देनी होती है तो हमेशा दो वायर दिए जाते हैं। इसमें एक फेज होता है और दूसरा न्यूट्रल। फेज वायर से करंट आता है और न्यूट्रल से वापस जाता है। अगर न्यूट्रल नहीं होगा तो सप्लाई रुक जाएगी, यानी करंट रुक गया। करंट जारी रहे इसलिए दोनों वायर लगाना जरूरी होता है। 


(ग्राउंड अर्थ के बारे में बताने से पहले मैं आपको थोड़ा से करंट के बारे में बता दूं। करंट यानी इलेक्ट्रॉन का फ्लो, जब इलेक्ट्रॉन तेजी से चलते हैं तो समझा जाता है कि वायर में करंट आ रहा है। करंट सप्लाई होता रहे इसके लिए जरूरी है कि इलेक्ट्रॉन के आने और जाने की व्यवस्था हो। यानी एक वायर से इलेक्ट्रॉन आएं और दूसरे से चले जाएं। ) 

अब बात करते हैं ग्राउंड अर्थिंग की। ग्राउंड आर्थिंग का कार्य लोगों को करंट लगने से बचाना होता है। दरअसल फेस से आने वाला करंट न्यूट्रल से वापस जाता है तो कोई दिक्कत नहीं होती है। लेकिन अगर फेस से आया करंट न्यूट्रल में जाने से पहले आपके डिवाइस के किसी भी खुले हिस्से से छू जाता है तो संबंधित डिवाइस में करंट आ जाता है। इस अनचाहे करंट से बचने के लिए हम ग्राउंड अर्थ का इस्तेमाल करते हैं। इसको लगाने से घर में प्रयोग होने वाले बिजली के उपकरण आपको कभी करंट नहीं मारेंगे।  

ये कैसे काम करता है

ग्राउंड अर्थ फेज से लीक करंट को पकड़कर उसे वायर के माध्यम से ग्राउंड में उतार देता है। इससे करंट लगने की संभावना खत्म हो जाती है। इसके अलावा यदि अचानक वोल्टेज तेज हो जाता है तो भी यह अतिरिक्त करंट को वायर के माध्यम से ग्राउंड में पहुंचा देता है और आपके घर के कीमती उपकरण फुंकने से बच जाते हैं। बिजली के बोर्ड में लगने वाले हर सॉकेट में ग्राउंड अर्थ के लिए प्रावधान किया गया है। 

मेरे हाथ ये जो तीन प्लग वाला पिन है। इसमें दो छोटे पिन फेज और न्यूट्रल के हैं और ये जो तीसरा मोटा पिन है यह है अर्थ का। इसे हमेशा ज्यादा बड़ा बनाया जाता है, ताकि जब भी आप बोर्ड में प्लक लगाएं तो उसमें प्रवाहित लीकेज करंट को यह पहले पकड़कर ग्राउंड में पहुंचा दें और आपको करंट के झटके से बचा दें। 

कैसे होती है ग्राउंड अर्थिंग


ग्राउंड अर्थिंग जैसा की नाम है ग्राउंड में होती है। इसको बनाने के लिए आपको मकान के किसी हिस्से में करीब सात से आठ फुट गहरा गड्ढा खोदकर उसमें नमक और कोयला की परत बिछा देनी चाहिए। इसके बाद एक तांबे की अर्थ प्लेट लेकर उसमें कॉपर वायर बांधकर उसे उस परत पर रखना चाहिए। इसके बाद तीन से चार बाद नमक और कोयले की परत को बिछा देना चाहिए। एक हिसाब से दस किलो नमक और दस से 12 किलो कोयला लगेगा। इसके बाद इस कॉपर वायर को एक प्लास्टिक पाइप से कवर कर ऊपर निकाल लेना चाहिए। ताकि जरूरत पर आप उस पाइप के जरिये कॉपर प्लेट तक पानी डाल सके। इसके बाद गड्ढे में पानी भरकर उसे पाट देना चाहिए। इस वायर को बोर्ड में जोड़कर पूरे घर में ग्राउंड अर्थ को दौड़ा दिया जाता है।

शनिवार, 30 जुलाई 2022

यूपी में अब प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री अब सिर्फ 6000 रुपये में


अब सिर्फ छह हजार रुपये में मकान की रजिस्ट्री होगी। जी हां उत्तरप्रदेश सरकार ने यह व्यवस्था कर दी है। यह नई व्यवस्था यूपी में 18 जून से शुरू की गई। फिलहाल यह छूट अगले छह महीने तक दी जा रही है। हालांकि यह छूट सिर्फ उन रजिस्ट्रियों में ही मिलेगी, जो रजिस्ट्रियां खून के रिश्ते में की जाएंगी। खून के रिश्ते में आने वालों में माता, पिता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, बहू, दामाद, सगा भाई, सगी बहन, पुत्र व पुत्री का बेटा-बेटी आदि। तो अगर आप भी इस कैटिगिरी में आते हैं तो यह आपके लिए सुनहरा अवसर है। तो चलिए जानते हैं पूरा मामला विस्तार से

दोस्तों,

अगर आप यूपी से हैं और अपने परिवार के किसी भी सदस्य के नाम अपनी कोई प्रॉपर्टी करने के बारे में सोच रहे हैं तो अगले छह महीने तक बहुत ही सुनहरा अवसर है। दरअसल उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने बीती 18 जून को कैबिनेट की बैठक में एक प्रस्ताव को हरी झंडी दी है। इसके तहत ब्लड रिलेश्न में प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री करवाने पर अब सिर्फ छह हजार रुपये ही देने होंगे। इसमें पांच हजार रुपये स्टांप ड्यूटी और एक हजार रुपये प्रोसेसिंग फीस के होंगे। भले ही प्रॉपर्टी कितनी ही महंगी क्यों न हो।

जबकि इससे पहले ऐसे मामलों में प्रॉपर्टी की डीएम सर्किल् रेट के हिसाब से कीमत तय करते हुए, उस कीमत पर आठ प्रतिशत स्टैंप ड्यूटी लेने का नियम था। इस नए नियम की शर्त बस एक ही है कि रजिस्ट्री ब्लड रिलेशन में हो और उसे संबंधित को दान दिया जाए। यानी की गिफ्ट डीड। गिफ्ट डीड वो डीड होती है, जिसके तहत परिवार के बड़े अपने बच्चों अथवा छोटे भाई बहन को अपनी प्रॉपर्टी बिना किसी कीमत के दान में देते हैं।

आमतौर पर परिवार के मुखिया, पारिवारिक सदस्यों के पक्ष में वसीयत कर देते हैं। क्योंकि रजिस्ट्री करवाके किसी को संपत्ति सौंपना काफी खर्च भरा होता है। मुखिया की मृत्यु के बाद परिवार के सदस्य प्रॉपर्टी को वसीयत के हिसाब से बांटकर अपना-अपना हिस्सा कब्जे में ले लेते हैं, लेकिन उसकी रजिस्ट्री नहीं करवाते हैं।

इससे वो लोग उस प्रॉपर्टी में मालिक तो हो जाते हैं, लेकिन उस प्रॉपर्टी पर लोन आदि नहीं मिलता है। कई बार तो मामला पुराना होने पर प्रॉपर्टी में परिवार के कई अन्य लोग दावेदारी ठोंक देते हैं। इस तरह के मामलों से पारिवारी कोर्ट में हजारों केस पेंडिंग है। बेवजह की मुकदमे बाजी से बचने के लिए ही योगी सरकार ने यह नई व्यवस्था दी है।



यूपी में स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन विभाग की प्रमुख सचिव वीना कुमारी ने इसके आदेश जारी कर दिए। इस योजना को अभी पायलट प्रोजेक्ट के तहत छह माह के लिए शुरू किया गया है। क्योंकि इससे सरकार को साल में करीब 200 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। इसलिए इसे ट्रॉयल के रूप में शुरू किया गया है। आगे चलकर इसे स्थायी किया जाएगा।

गिफ्ट डीड के दायरे में आने वाले पारिवारिक सदस्यों में पिता, माता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, बहू, दामाद, सगा भाई, सगी बहन, पुत्र व पुत्री का बेटा-बेटी आएंगे। स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन विभाग ने इसकी अधिसूचना पिछले 18 जून को जारी कर दी है। अभी ऐसे मामलों में संपत्ति के विक्रय विलेख (सेल डीड) की रजिस्ट्री के तहत संपत्ति के मूल्य का आठ प्रतिशत तक स्टांप व निबंधन शुल्क देना होता है।


हालांकि छूट की यह सुविधा महाराष्ट्र, कर्नाटक व मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में पहले से ही थी। अब तक उत्तर प्रदेश में यह छूट नहीं दी जा रही थी।

भारतीय स्टांप अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रदेश सरकार को ऐसी छूट देने का अधिकार है।





शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

प्लॉट खरीदना है, लेकिन डर लगता है कि कहीं मेरे साथ कोई फ्रॉड न हो जाए....

 प्लॉट खरीदना है, लेकिन डर लगता है कि कहीं मेरे साथ कोई फ्रॉड न हो जाए। प्लॉट कैसे खरीदें, किन बातों को ध्यान रखें ताकि धोखाधड़ी से बचे रहें। प्राधिकरण, आवास विकास अथवा सोसाइटी में किसका प्लॉट लिया जाए। इन सभी बातों पर आज हम बात करेंगे। 

इस विडियो को देखने के बाद आप अपनी जरूरत के अनुसार प्लॉट खरीद पाएंगे। तो चलिए शुरू करते हैं। 


दोस्तों हर किसी को अपना आशियाना बनाने के लिए भूखंड खरीदना होता है। या फिर बना बनाया मकान। अगर बजट कम हो तो भूखंड खरीदकर बनवाना सस्ता सौदा कहा जाता है। वैसे तो हर गली मुहल्ले में प्रॉपर्टी डीलर मिल जाएंगे, जो आपको भूखंड अथवा मकान खरीदने में मदद करेंगे, लेकिन इसमें काफी सावधनियां बरतनी जरूरी होती है। क्योंकि यह डीलर अपने कमीशन के लिए हर पैंतरा अपनाते हैं, कई बार देखा गया है कि प्रॉपर्टी डीलर आपको विवादित प्लॉट बेच देते हैं, ऐसे में आपका समय और पैसा दोनों खराब होते हैं। इसलिए काफी सोच विचार कर ही मकान अथवा भूखंड लेना चाहिए। 

कोशिश करें कि प्राधिकरण अथवा आवास विकास का प्लॉट खरीदें : दोस्तों जिला विकास प्राधिकरण के भूखंड को खरीदना ज्यादा अच्छा माना जाता है, क्योंकि इसमें धोखाधड़ी की गुंजाइश न के बराबर होती है। इसके आलावा इसके भूखंड पर बिजली, पानी, रोड, सीवर, मार्केट, स्कूल आदि जैसी मूलभूत सुविधाएं भी मिलती है। इसके अलावा प्राधिकरण समय समय पर जरूरत पर अपने क्षेत्र में विकास कार्य करता रहता है। प्राधिकरण से सस्ता मकान या भूखंड लेने के लिए योजनाएं आती रहती हैं, इस पर नजर बनाकर रखें, ताकि आप सीाधे प्राधिकरण से प्रॉपर्टी खरीद सकें। यहां पर आपको प्रॉपर्टी नीलामी और लॉटरी के माध्यम से मिलती है। हालांकि यहां की प्रॉपर्टी को ब्लैक में भी खरीदा जा सकता है। इसमें आपको इसकी रीसेल की प्रॉपर्टी मिल सकती है। 


आवास विकास से प्रॉपर्टी लेना फायदे का सौदा : आवास विकास परिषद का गठन ही शहर में लोगों के लिए आवास की व्यवस्था करना है। यह समय समय पर आवासीय याोजनाएं लाता रहता है। इसके लिए जरूरमंद को परिषद की वेबसाइट पर विजिट करते रहना चाहिए। यहां से आपको किश्तों में प्रॉपर्टी मिल सकती है, क्योंकि प्राधिकरण और आवास विकास की प्रॉपर्टी पर आसानी से लोन मिल जाता है। 

आवास विकास परिषद की प्रॉपर्टी में आपको बिजली, सड़क, सीवर, पानी, मार्केट, पार्क, स्कूल जैसी सभी व्यवस्थाएं मिलती है। यहां पर भी धोखााधड़ी की संभावना न के बराबर है। 

सोसाइटी में प्लॉट खरीदने से पहले पड़ताल करें : अगर आपका बजट कम है और आप शहर के बाहरी इलाकों में प्राइवेट बिल्डर द्वारा बेचे जा रहे प्लॉट खरीदने की सोच रहे हैं तो आपको काफी सजग रहने की जरूरत है। यहां पर धोखाधड़ी की संभावनाएं 76 प्रतिशत तक हैं। इसलिए ऐसी जमीन को खरीदते समय खास ध्यान पड़ेगा। अगर आप इस झंझट से बचना चाहते हैं तो कोशिश करें कि उक्त भूखंड पर किसी बैंक से लोन ले लें। बैंक आपको पीएलसी पर लोन देगा, इससे पहले वो जमीन की पड़ताल खुद करेगा। ऐसे में आपका सिरदर्द कम हो जाता है। लेकिन इसके लिए बैंक आप से करीब 5000 रुपये फाइल शुल्क के नाम पर पहले ही जमा करवा लेगा। हालांकि ये शुल्क तीन महीने तक मान्य होगा। यानी आप तीन महीने में अगर कोई दूसरा प्लॉट देखते हैं तो बैंक नि:शुल्क लोन प्रक्रिया शुरू करेगा। 


गुरुवार, 29 जुलाई 2021

मेक इन इंडिया का लोगो मेक इन फॉरेन है!

  

शेखर कुमार त्रिपाठी

मेक इन इंडिया, इस शब्द से हर भारतीय को लगाव होगा। ऐसे शब्दों को चुनने के लिए बीजेपी काफी रिसर्च करती है। ताकि लोग देश के नाम पर एकजुट हो जाएं। लेकिन आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मेक इन इंडिया का यह लोगो भी विदेशी फर्म ने बनाया है। इसे दुनिया के कई मशहूर लोगो डिजाइन करने वाली कंपनी वेइडेन प्लस केनेडी इंडिया लिमिटेड ने डिजाइन किया है। यह बात सही है, लेकिन इसमें भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोच विचार कर ही विदेशी क्रिएटिव एजेंसी को हायर किया है।


(मेक इन इंडिया का लोगो डिजाइन करने वाली विज्ञापन एजेंसी वेइडेन प्लस केनेडी के डायरेक्टर वी सुनील)

इस लोगो को तीन डिजाइनरों की टीम ने डिजाइन किया है। इसमें मुख्य रूप से चेर्मेयफ और गीस्मर का नाम है। जिन्हें कॉरपोरेट कंपनियों के लोगो डिजाइन में महारथ हासिल है। इन्होंने चेस बैंक (1964), मोबिल ऑइल (1965), पीबीएस, एनबीसी और नेशनल ज्योग्राफिक जैसी फर्म के लोगो को डिजाइन किया है।

मेक इन इंडिया का लोगो एक शेर का सिल्हूट है। जो पूरी तरह से लोहे के चक्रदंतों से बना है। जोकि निर्माण, ताकत और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। राष्ट्रीय चिह्न अशोक चक्र में भी चार शेर है। भारतीय लोककथाओं में शेर शक्ति, साहस, गर्व और आत्मविश्वास का प्रतिनिधित्व करने के अलावा, ज्ञान की प्राप्ति को दर्शाता है।

लोगो को विदेशी कंपनी की इंडियन ब्रांच ने डिजाइन किया है। इस बात का खुलासा राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट (RTI) से मिली जानकारी में हुआ है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने मध्य प्रदेश के एक्टिविस्ट चंद्र शेखर गौड़ के प्रश्न का जवाब देते हुए बताया कि मेक इन इंडिया का लोगो डिजाइन करने के लिए कोई टेंडर नहीं निकाला गया था। 2014-15 में मंत्रालय ने लोगो डिजाइन के लिए क्रिएटिव एजेंसी को चुनने के लिए टेंडर आमंत्रित किया था। इसी के आधार पर वेइडेन प्लस केनेडी इंडिया लिमिटेड को चुना गया था।

हालांकि यहां विपक्ष और आलोचकों को यह समझना होगा कि मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया दो अलग-अलग शब्द है। दोनों के अर्थ अलग है। 'मेड इन इंडिया' भारत में देश के ही कच्चे माल का प्रयोग कर तैयार किए गए उत्पाद की बात करता है। जबकि मेक इन इंडिया विदेशी सामान को तैयार करने में सिर्फ भारत की जगह और यहां के लेबर को इस्तेमाल करने को बढ़ावा देने का मिशन है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी मिशन मेक इन इंडिया का लोगो यद्यपि एक विदेशी कंपनी द्वारा बनाया गया है। यह लोगो देश को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाने के लक्ष्य को दर्शाता है। ऐसे में इस लोगो को विदेशी कंपनी द्वारा बनाया जाना चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन इसके पीछे की मंशा विदेशी पूंजी को भारत लाने से जुड़ी है, ऐसे में इसका विदेशी लोगो की तुलना में आकर्षित होना और भारतीय मूल तत्वों को समेटना जरूरी था। इसलिए इस लोगो बनाने के लिए देश और देश की संयुक्त समझ रखने वाली कंपनी को चुना गया है।

मोदी सरकार ने इस लोगो न सिर्फ बनवाने के लिए अमेरिका की विज्ञापन एजेंसी वेइडेन प्लस केनेडी को हायर किया था, बल्कि उसके प्रचार के लिए भी 11 करोड़ रुपये खर्च किए थे। यही नहीं सरकार ने अपनी पूर्व अनुमति के बिना मेक इन इंडिया लोगो के उपयोग पर सख्ती से प्रतिबंध लगा दिया था, ताकि इस लोगो का दुरुपयोग न हो सके।

बुधवार, 28 जुलाई 2021

आखिर पेगासस पर क्यों मचा है बवाल, जाने पूरी कहानी


शेखर कुमार त्रिपाठी

आज पेगासस स्पाईवेयर को लेकर संसद में हंगामा हुआ है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि इस स्पाईवेयर का इस्तेमाल मोदी सरकार ने कुछ लोगों की जासूसी करने के लिए किया है। दरअसल पेगासस स्पाईवेयर एक तरह का वायरस है। जो आपके मोबाइल में आकर आपका डेटा दूसरों को भेजता है। यानी की जासूसी करने के लिए ही इसे डिजाइन किया गया है। इस वायरस को कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि ये आसानी से एंड्राइड और आईओएस मोबाइल फोन में अपनी जगह बना लेता है। आमतौर पर कहा जाता है कि कोई वायरस मोबाइल फोन में तब प्रवेश करता है जब आप कोई अनजान लिंक क्लिक करते हैं, या फिर कोई अनजान कॉल रिसीव करते हैं। लेकिन पेगासस स्पाईवेयर बहुत ही एडवांस टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करता है। यानी की इसे आपके मोबाइल पर जाने के लिए न तो लिंक भेजने की जरूरत है और न ही कोई कॉल करने की। इसको किसी के मोबाइल में डालने के लिए बस उसका नंबर पता होना ही काफी है। एक एसएमएस अथवा मिसकॉल देकर भी आप इसे मोबाइल में अपलोड कर सकते हैं। यानी अगर आप अनजान कॉल नहीं भी उठाते हैं तो भी यह वायरस आपके मोबाइल फोन पर अपनी पैठ बना सकता है। 

अगर यह वायरस आपके मोबाइल में एक बार आ गया तो न सिर्फ आपके मोबाइल का डेटा, बल्कि आपकी कॉल रिकॉर्डिंग से लेकर विडियो रेकॉर्डिंग तक दूसरों के पास पहुंच सकती है। यही नहीं यह वायरस आपके मोबाइल से आपकी फोटो तक क्लिक कर दूसरों को भेज सकता है। कहा जा रहा है कि यह वायरस माइक्रोफोन को भी हैक कर लेता है और किसी के द्वारा बोले गए वाक्यों को सुनने की क्षमता रखता है। दुनिया भर में कई सरकारें इस वायरस का इस्तेमाल अपने देश में आतंकवाद और क्राइम को खत्म करने के लिए कर रही हैं। 

 इस कंपनी ने बनाया है पेगासस स्पाईवेयर


पेगासस स्पाईवेयर को इजरायल की एनएसओ (Niv carmi Shalev hulio Omri lavie) कंपनी ने बनाया है। इस कंपनी का नाम तीन फाउंडर के नाम पर रखा गया है। इसमें एक Niv carmi है। दूसरे का नाम Shalev hulio है जबकि तीसरे फाउंडर Omri lavie है। इजरायल की कंपनी एनएसओ का दावा है कि उन्होंने यह स्पाईवेयर ड्रग माफिया, क्राइम और आतंकवादियों की पहचान कर उनके खात्मे के लिए तैयार किया है। खुद मैक्सिको सरकार ने कहा कि उन्होंने इस स्पाईवेयर का इस्तेमाल कर मशहूर ड्रग माफिया एल चापो को पकड़ा है। इस तरह से देखा जाए तो यह स्पाईवेयर काफी सराहनीय है।


क्यों आया चर्चा में

दरअसल मैक्सिको में पहली बार मालूम हुआ कि मैक्सिको सरकार ने एक पत्रकार की जासूसी में इस पेगासस स्पाई वेयर का इस्तेमाल किया था। इस पत्रकार ने वहां कई बड़े घोटालों का खुलासा किया था। बाद में इस पत्रकार की हत्या हो गई थी। इसके अलावा एक और मामला चर्चा में आया था जब वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार जमाल की हत्या कर दी गई थी। इस हत्या को लेकर कहा गया था कि सऊदी अरब की सरकार ने ही पत्रकार की हत्या करवा दी है। जांच में मालूम हुआ था कि पत्रकार जमाल की हत्या के कुछ दिन पहले ही उसकी वाइफ के मोबाइल में भी पेगासस स्पाईवेयर को इंस्टॉल किया गया था।  

यह पेगासस तब भी चर्चा में आया था जब सऊदी अरब के प्रिंस ने अमेजॉन के मालिक जेफ बेजॉस का फोन हैक कर लिया था। जेफ बेजॉस को यह बात तब पता चली जब उन्होंने गौर किया कि उनका मोबाइल आवश्यकता से ज्यादा डेटा  खर्च कर रहा है। हाल ही में इसके चर्चा में आने की वजह है फ्रांस के एनजीओ फॉरबिडन स्टोरी का खुलासा। फॉरबिडन स्टोरी ने अमेटी इंटरनेशनल की टेक्निकल मदद से 50 हजार मोबाइल नंबर जारी किए हैं। इन नंबरों पर पेगासस इंस्टॉल किया गया था या फिर यह लोग पेगासस के लिए बतौर टॉरगेट चुने गए थे।  इसमें 10  देशों के 80 से ज्यादा पत्रकार, 17 मीडिया संस्थान भी शामिल हैं। 

इन 11 देशों की सरकारों ने पेगासस स्पाई वेयर के लिए किया भुगतान

अमेटी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 11 देशों में इस स्पाईवेयर के क्लाइंट सामने आए हैं। इसमें शामिल देशों में टोगा, रवांडा, मोरक्को, सऊदी अरब, बहरीन, यूएई, अजर बैजान, कजाकिस्तान, मैक्सिको, हंगरी और भारत शामिल है। इन सभी देशों में लोकतंत्र की रैंक काफी नीचे है। भारत की तुलना में सभी की रैंक बहुत नीचे है। यानि हम कह सकते हैं कि इस स्पाईवेयर का इस्तेमाल ज्यादातर उन देशों ने किया जहां डेमोक्रेसी रैंक काफी कम है। एनएसओ का दावा है कि वो इस स्पाई वेयर को सिर्फ सरकार को बेचती है, क्योंकि इसको बनाने का उद्देश्य आतंकवाद और क्राइम के खात्मे के लिए किया गया है। 

क्या पेगासस स्पाईवेयर से बचा जा सकता है

आपको बता दें कि अब तक ऐसा कोई तरीका नहीं मिला है, जिससे इस वायरस से बचा जा सकता हो। केवल एक ही उपाय है कि आप अपना मोबाइल नंबर ही किसी अनजान को न दें, हालांकि यह हो पाना मुमकिन नहीं है। यानी अब तक पेगासस स्पाईवेयर का कोई तोड़ नहीं निकला है। इस स्पाई वेयर के कारण ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुल मैक्रा ने अपना फोन बदल लिया है।

पचास हजार की लिस्ट में भारत के तीन सौ लोगों के नाम शामिल 

अमेटी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने जो पचास हजार मोबाइल नंबर जारी किए हैं, उसमें से तीन सौ नंबर भारत के हैं। इन मोबाइल नंबरों पर वर्ष 2017 से 2019 के बीच पेगासस स्पाई वेयर इंस्टॉल किया गया था


राजनेता

राहुल गांधी और उनके दो सलाहकार

प्रशांत किशोर 

अभिषेक बनर्जी

वसुंधरा राजे के पर्सनल सचिव

प्रवीन तोगड़िया 

आईटी मंत्री अश्विनी वर्षेण्य


सरकारी अफसर

पूर्व सीबीआई चीफ आलोक वर्मा

सीबीआई के सीनियर अफसर राकेश आस्थाना

इलेक्शन कमिश्नर आशोक लवासा

पत्रकार

फ्रीलांसर रोहिनी सिंह

ये वही रोहिनी सिंह हैं जिन्होंने जय शाह की खबर उठाई थी कि कैसे उनकी कमाई एक साल में 16000 गुना तक बढ़ी है।

द हिंदू की पत्रकार विजेता सिंह

विजेता सिंह ने खबर छापी थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा का बजट एक साल में 33 से 333 करोड़ कर दिया गया । इस पर प्रशांत भूषण ने कहा था कि 300 करोड़ का इस्तेमाल पेगासस स्पाई वेयर खरीदने मे किया गया था। अगले साल यह बजट 800 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। प्रशांत भूषण के आरोप का सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है। 

इसके अलावा  स्वाति सिंह, इंडियान एक्सप्रेस के जर्नलिस्ट सुशांत सिंह, इंडिया टुडे के जर्नजिस्ट संदीप जैसे कई अन्य पत्रकार हैं। यहां तक की सीजेआई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की स्टाफ में शामिल महिला के मोबाइल में भी पेगासस स्पाई वेयर इंस्टॉल किया गया था।


पेगासस की जासूसी में काफी खर्च आता है : दरअसल पेगासस स्पाई वेयर को खरीदना काफी महंगा है। दस फोन में इंस्टॉल करने के लिए यह पांच करोड़ रुपये खर्च होते हैं। 


अब आप जरा सोचे कि जो स्पाईवेयर आतंकवादियों और ड्रग माफिया के खात्मे के लिए बना था, उसका इस्तेमाल विपक्षी राजनेता, पत्रकार मानवाधिकार संगठन चलाने वाले सामाजिक लोगों पर किया जा रहा है। क्या यह पेगासस स्पाई वेयर वाकई श्वेत पंखों वाला घोड़ा है, या फिर ऐसा हथियार जो गलत हाथों में आने क बाद लोकतंत्र के खात्मे की वजह। दरअसल पेगासस शब्द उस श्वेत पंखों वाले घोड़े के लिए इस्तेमाल होता है जो धरती पर शांति कायम करने के लिए आया है। अब  अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।