गुरुवार, 31 मार्च 2016

फूलों में छिपा है सेहत का खजाना

 फूलों में छिपा है सेहत का खजाना



फूलों से भी सेहत बनाई जा सकती है। जी हां, फूल सिर्फ खुशबू देने के लिए नहीं होते, बल्कि इनमें कई प्रकार के पोषक तत्व भी मौजूद होते है। ये पोषक तत्व कई बीमारियों को शरीर से दूर रखते हैं। फूलों में फाइबर, कैल्शियम, विटामिन, प्रोटीन और मिनरल का भंडार होता है, जिनकी जरूरत शरीर को होती है। आइए हम आपको बताते है कि किस फूल में सेहत के कितने राज छिपे हैं।

गुड़हल 


 गुड़हल का फूल विटामिन सी, कैल्शियम, वसा, फाइबर, आयरन का बढ़िया स्रोत है। मुंह के छाले में गुड़हल के पते चबाने से लाभ होता है। इसके अलावा गुड़हल के फूल का प्रयोग कॉलेस्ट्रॉल, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर और गले के संक्रमण जैसे रोगों के इलाज में प्रयुक्त होने वाली दवाओं में किया जाता है।

गुलाब 


सुबह अगर खाली पेट गुलाबी गुलाब की दो पखुड़ियां खा ली जाएं तो दिन भर ताजगी बनी रहती है। क्योंकि गुलाब बेहद अच्छा ब्लड प्यूरिफायर है। अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर, ब्रोंकाइटिस, डायरिया, कफ, फीवर, हाजमे की गड़बड़ी में गुलाब का सेवन बेहद उपयोगी होता है। आंखों की जलन और खुजली दूर करने के लिए गुलाब जल का प्रयोग किया जाता है।

कमल

 कमल के फूल फोड़े-फुंसी को दूर करते हैं।  इसकी पंखुड़ियों को खाने से मोटापा कम होता है, रक्त विकार दूर होते हैं और मन प्रसन्न रहता है। इसकी पंखुड़ियों को पीसकर चेहरे पर मलने से सुंदरता बढ़ती है। इन फूलों के पराग से मधुमक्खियां शहद बनाती हैं।

मोगरा


यह गर्मियों का एक खुशबूदार फूल है। इन फूलों को अपने पास रखने से पसीने की दुर्गंध नहीं आती है। इसकी कलियां चबाने से महिलाओं को मासिक धर्म में होने वाली परेशानी कम होती है। मोगरे के फूल मसलकर स्नान करने से त्वचा में प्राकृतिक ठंडक का एहसास होता है। जिससे दिन भर ताजगी रहती है।

गेंदा


 - घरों में गेंदे का पौधा जरूर लगाना चाहिए, क्योंकि इसके फूलों को घाव भरने का सर्वश्रेष्ठ मरहम माना जाता है। गेंदे के फूलों को तुलसी के पतों के साथ पीस कर मलहम बनाया जाता है। चर्म रोग या शरीर के किसी हिस्से में सूजन आ जाने पर इन फूलों को पीसकर पेस्ट बनाकर लगाने से फायदा होता है। गेंदे के रस से कुल्ला करने पर दांत दर्द और कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है। हाल ही में हुई एक रिसर्च के मुताबिक गेंदे की महक से मच्छर दूर भागते हैं।

चमेली - 


खुशबू से भरे ये फूल बेहद नाजुक होते हैं। चमेली के फूलों से बना तेल चर्म रोग, दंत रोग, घाव आदि पर गुणकारी है। चमेली के पत्ते चबाने से मुंह के छालों में तुरंत राहत मिलती है। ये त्वचा और बालों के लिए उपयोगी है, रात को पानी में भिगो दीजिए, सुबह पीस लीजिए व गुलाब जल मिला दीजिए। इसे बालों में लगाने से चमक व चेहरे पर लगाने से त्वचा में निखार आता है।


बुधवार, 30 मार्च 2016

कच्चा पपीता खाएं, इम्यून सिस्टम रहेगा मजबूत



हमारे शरीर में जो भी बीमारियां होती है, उसका मुख्य कारण होता है शरीर का कमजोर इम्यून सिस्टम। इम्यून सिस्टम के कमजोर होने का मतलब है कि शरीर की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का घटना। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता उसको मिलने वाले पोषक तत्वों पर निर्भर करती है। कच्चा पपीता और उसके बीज में बहुत सारा विटामिन ‘ए’, ‘सी’ और ‘ई’ होता है, जो कि शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। कच्चा पपीता सर्दी और जुखाम में भी फायदा करता है। यह शरीर में बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है। पपीते का रस अरूचि, अनिद्रा, सिर दर्द आदि रोगों को ठीक करता है। यह कब्ज से छुटकारा भी दिलाता है। पेप्सिन नामक तत्व पके हुए पपीते के बजाए कच्चे पपीते में होता है, इससे पेट की कब्ज दूर होती है। इसके अलावा और भी कई तरीके हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत कर सकते हैं।

जिंक युक्त खाद्य पदार्थ लें

 जिंक ऐसा मिनरल है जो एंटीबॉडीज, टी-सेल्स व सफेद रक्त कणों में बढ़ोत्तरी कर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। एक शोध के अनुसार, जिंक की कमी होने पर शरीर बैक्टीरिया, वायरस व परजीवी द्वारा किए गए आक्रमणों से आपका बचाव नहीं कर पाता है। अमेरिकन नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के विशेषज्ञ डॉ. नोवेरा के अनुसार, जिंक उम्र के साथ होने वाले इम्यून सिस्टम की कमजोर होने की प्रक्रिया को धीमा करता है। योगर्ट, कद्दू के बीज में जिंक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।

 खूब पिएं पानी

 प्रचुर मात्रा में पानी का सेवन किडनी की कार्यप्रणाली को चुस्त-दुरस्त रखने और शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने के लिए बहुत जरूरी होता है। इससे इम्यून सिस्टम में मजबूती आती है।

नींद पूरी लें

साल 2001 में पब्लिश स्लीप स्टडी के जर्नल सेमिनार्स के क्लीनिकल न्यूरोसाइकाइट्री के लेखकों के अनुसार आपके शरीर और मस्तिष्क के ठीक ढंग से काम करने के लिए 6-8 घंटे की नींद बहुत जरूरी है। अगर आप पर्याप्त नींद नहीं लेते तो इम्यून तंत्र कमजोर हो जाता है। इसलिए पूरी नींद लें।

पौष्टिक भोजन लें

 शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वस्थ भोजन बहुत जरूरी है। इम्युनिटी को बेहतर बनाने में संपूर्ण और संतुलित आहार लें।  गहरे रंग की सब्जियों को इस्तेमाल ज्यादा करें।

तनाव कम लें

छोटी-छोटी बात पर तनाव न लें। तनाव अप्रत्यक्ष रूप से इम्यून सिस्टम को प्रभावित करता है। तनाव से पाचन तंत्र प्रभावित होने के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगता है।

मोटापा कम करें

यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ कैरोलिना चैपल हिल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में हुए शोध के अनुसार, मोटापा प्रतिरक्षा प्रणाली के कार्य के बीच बाधा उत्पन्न करता है, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए अपनी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए सबसे पहले अपने मोटापे को कम करें।

शनिवार, 26 मार्च 2016

युवाओं में मोटापा बढ़ना दिल के लिए खतरनाक





यदि आपकी उम्र 20 से 35 के बीच है और आप का वजन बढ़ रहा है तो सावधान हो जाइए। हाल ही में दिल की बीमारी पर की गई एक रिसर्च में पाया गया है कि अब ऐसे मोटे युवा दिल की बीमारी का शिकार हो रहे हैं, जो धूम्रपान करते हैं। साथ ही डायबिटीज और हाई ब्लडप्रेशर से ग्रस्त हैं। मुख्य शोधकर्ता एवं क्लीवलैंड क्लीनिक के समीर कपाड़िया के मुताबिक दिल की बीमारी से बचने के लिए हमें अपनी दिनचर्या में सुधार करना होगा। पिछले दो दशकों में भारत में बैड लाइफस्टाइल, तनाव, एक्सरसाइज ना करने और बैड फूड हैबिट्स की वजह से लोगों को दिल की गंभीर बीमारियां होने लगी है।

ये लक्षण बताएंगे दिल की बीमारी है या नहीं

पेट में दर्द- दिल संबंधी कोई भी गंभीर समस्या होने से पहले कुछ लोगों को मितली आना, हृदय में जलन, पेट में दर्द होना या फिर पाचन संबंधी दिक्कतें आने लगती हैं।
हाथ में दर्द होना- कई बार दिल के रोगी को छाती और बाएं कंधे में दर्द की शिकायत होने लगती है। ये दर्द धीरे-धीरे हाथों की तरफ नीचे की ओर जाने लगता हैं।
कई दिनों तक कफ होना- यदि आपको काफी दिनों से खांसी-जुकाम हो रहा है और थूक सफेद या गुलाबी रंग का हो रहा है तो ये हार्ट फेल का एक लक्षण है।
पसीना आना- सामान्य से अधिक पसीना आना खासतौर पर तब जब आप कोई शारीरिक क्रिया नहीं कर रहे तो ये आपके लिए एक चेतावनी हो सकती है।
पैरों में सूजन- पैरों में, तलवों में सूजन आने का मतलब ये भी हो सकता है कि आपके हार्ट में ब्लड का सरकुलेशन ठीक से नहीं हो रहा।

इनका इस्तेमाल करें तो दूर रहेगी दिल की बीमारी

खाने में सरसों के तेल का नियमित इस्तेमाल करें।
कच्चा लहसुन रोज सुबह खाली पेट छील कर खाएं।
सेब का जूस और आंवले का मुरब्बा खाएं। 
एक चम्मच शहद प्रतिदिन लें, दिल को मजबूती मिलेगी।
रोज 50 ग्राम कच्चा ग्वारपाठा खाली पेट खाने से भी कोलेस्ट्रॉल कम हो जाता है।
लौकी उबालकर उसमें धनिया, जीरा व हल्दी मिलाकर खाएं।
अनार के रस में मिश्री मिलाकर हर रोज सुबह-शाम पीने से दिल मजबूत होता है।
बादाम खाने से दिल सेहतमंद रहता है क्योंकि इसमें विटामिन और फाइबर भरपूर मात्रा में होता है।

गुरुवार, 24 मार्च 2016

डायबिटीज है तो पिएं खरबूजे का रस



यदि आपको डायबिटीज है तो खरबूजे का रस पिएं आपको लाभ मिलेगा। यह ब्लड में शुगर लेवल को निंयत्रित करता है। डायबिटीज के रोगियों के लिए खरबूजा एक औषधि की तरह काम करता है। इसके अलावा खरबूजे में प्रोटिन, कैल्शियम, मैग्नेशियम, पौटेशियम, क्लोरिन, सोडियम व सल्फर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यदि आप पूरी गर्मी नियम से रोज एक खरबूजा खाएंगे तो आप में मैकुलर डीजेनेरेशन का खतरा 36 प्रतिशत तक कम हो जाएगा।  मैकुलर डीजेनेरेशन ढलती उम्र के साथ होने वाली समस्या है, जिससे आंखों की रोशनी भी जा सकती है। खरबूजा उच्च बीटा-कैरोटेन  उपलब्ध कराता है, जोकि मैकुलर डीजेनेरेशन को खत्म करने के लिए जरूरी है।


खरबूजा खाने के दस लाभ

- नियमित रूप से खरबूजे का सेवन करने वालों की किडनी स्वस्थ बनी रहती है। यह एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में विटामिन का अच्छा स्रोत है।
- खरबूजा लंग कैंसर से हमारे शरीर की रक्षा करने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद विटामिन सी और बिटा- कैरोटेन मिलकर कैंसर रोकने में सहायक हैं।
- इसमें मौजूद पानी की ज्यादा मात्रा शरीर में पानी की कमी की भरपाई करता है। इसी वजह से हमारा शरीर गर्मियों में पसीने के रूप में शरीर से निकले पानी के भरपाई तुरंत कर लेता है।
- वजन कम करने के लिए भी खरबूजा बहुत अनुकूल फल है, क्योंकि इसमें काफी मात्रा कैलोरी या शुगर मौजूद होती है। जोकि वजन कम करने के लिए जरूरी है।
- इसके गूदे में मौजूद नारंगी रंग के रेशे या फाइबर काफी मुलायम होते हैं, जिन्हें कब्जियत की शिकायत रहती है, वे खरबूजा खाएं, तो उन्हें फायदा होगा।
-  डायबिटीज के रोगियों के लिए भी खरबूजा एक औषधि की तरह काम करता है। डायबिटीज से पीड़ित लोगों को खरबूजे का जूस पीना चाहिए। 
- खरबूजा विटामिन बीटा-कारोटीन के रूप में विटामिन ए उपलब्ध कराता है, जो आंखों के लिए विशेष लाभप्रद होता है।
- पुरानी खाज में खरबूजे का रस लाभदायक है। अगर आप लगातार खरबूजा खाएंगे तो त्वचा में रुखापन नहीं आएगा।
- खरबूजे में एडेनोसीन नामक एंटीकोएगुलेंट पाया जाता है, जो रक्त कोशिओं को जमने से रोकता है। रक्त कोशिकाओं के जमने से ही दिल की बीमारी होती है।
-  खरबूजा में विटामिन बी पाया जाता है। विटामिन बी शरीर में ऊर्जा के निर्माण में सहायक होता है।
-  अगर खरबूजे में नींबू मिलाकर इसका सेवन किया जाए तो इससे गठिया की बीमारी भी ठीक हो सकती है।
- आप अक्सर तनाव में रहते हैं तो गर्मियों में खरबूजा खाना न भूलें। क्योंकि खरबूजे में भरपूर मात्रा में पोटेशियम पाया जाता है। 

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

बच्चों को सुधार का मौका दिए बिना कठोर सजा कितनी सही

बच्चों को सुधार का मौका दिए बिना कठोर सजा कितनी सही


राज्यसभा से पास होने के बाद जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन) बिल अब कानून में परिवर्तित हो जाएगा।  नए कानून के अंतर्गत अब 16 से 18 साल का कोई नाबलिग गंभीर अपराध (हत्या और रेप जैसे जघन्य अपराध)  करेगा तो उसके खिलाफ व्यस्कों की तरह ही केस चलेगा। हालांकि इसका फैसला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड करेगा। इसके लिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर 'जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड' इसकी जांच कर यह तय करेगा कि उसे 'बच्चा' माना जाए या 'वयस्क'।  वयस्क माने जाने पर किशोर को मुक़दमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाएगा।


जुवेनाइल जस्टिस कानून में जघन्य अपराध करने वाले की उम्र 18 साल से घटाकर 16 साल कर दी गई है, लेकिन इस पर आमराय अभी भी बंटी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि निर्भया कांड जैसी घटनाओं को देखते हुए उम्र घटाना जरूरी था, जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि किसी एक घटना के आधार पर कानून बदलना जल्दबाजी है। 

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में चाइल्ड राइट्स के लिए काम करने वाली एहसास संस्था की शचि सिंह का कहना है कि इस कानून से चाइल्ड राइट्स के लिए काम करने वाले कोई भी एक्टिविस्ट खुश नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि अपराध में बच्चों का प्रयोग किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में तो अधिकांश केस फर्जी निकलते हैं। ऐसे में बच्चों की पूरी जिंदगी खराब हो जाएगी। उन्होंने कहा कि ‘हम लोग बच्चों के साथ काम करते हैं, इसलिए हम इसके प्रभाव को समझ सकते हैं। महिला एवं बच्चों के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्था आली की रेनू मिश्रा का मानना है कि नाबालिग के रिफॉर्म पर बात होनी चाहिए, लेकिन यहां पूरा कानून बदल दिया गया। जब यह कानून बना था तो पूरी दुनिया में रिसर्च के बाद इसे बनाया गया था। अब जो यह बिल पास किया गया उसमें न किसी विशेषज्ञ से राय ली गई और न ही इसकी बारीकियों को समझा गया है। बल्कि गुपचुप तरीके से इसे पास कर दिया गया है। रेनू कहती है कि इस संशोधन प्रस्ताव का मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के विरोध करने के बावजूद इसे एक संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। इस समिति ने 16-18 साल की उम्र के नाबालिग़ों पर आईपीसी के तहत मुकदमा चलाने का विरोध किया, लेकिन कैबिनेट और लोकसभा ने नए बिल को स्वीकृति दे दी।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अरविंद जैन ने भी बीबीसी को दिए अपने इंटरव्यू में कहा है कि बच्चों के प्रति जो राष्ट्र और समाज की जिम्मेदारी है उसे सिर्फ एक मामले पर जनभावनाओं या मीडिया के दबाव में नहीं बदला जा सकता। उन्होंने यहां तक कहा है कि वाजपेयी सरकार में मंत्री रहीं मेनका गांधी ने ही इस उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 साल करवाया था। और आज मेनका गांधी ने ही इस उम्र को कम करने का प्रस्ताव दिया है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2014-15 में जितने अपराध हुए हैं उसमें से जुवेनाइल से जुड़े अपराधों का हिस्सा 1.2 प्रतिशत है। बड़ी बात यह है कि यह प्रतिशत पिछले कुछ सालों से नियत है। जबकि भारत में युवाओं और जुवेनाइल की संख्या अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है। इसके बावजूद मीडिया में कहा जाता है कि जुवेनाइल से जुड़े जघन्य अपराध बढ़ रहे हैं। ये सरासर गलत है। ऐसी गलत बातों को सामने रखकर नाबलिग की उम्र 18 से घटाकर 16 किया जाना सरासर गलत है। इन्हें जेल में खतरनाक अपराधियों के साथ रखेंगे तो जब ये सुधरने की बजाय और ज्यादा अपराधी होकर बाहर निकलेंगे।
लखनऊ यूनिवर्सिटी की पहली महिला कुलपति और महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था सांझी की रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि बाल सुधार गृह में जो काम करने चाहिए, उसे ना करके नाबालिग अपराधी को बालिग की तरह फांसी पर लटका देना देश हित में नहीं है। हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि बच्चों को सुधारने के लिए जो कानून और नीतियां बनाई गई हैं उसका सही ढंग से क्रियान्वयन कराना, लेकिन हम अपनी इस जिम्मेदारी से बचने के लिए उन्हें सजा का डर दिखा रहे हैं।

सिर्फ एक निर्भया के लिए बदला कानून


दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के आरोपियों को कड़ी सजा दिलाने की मांग पूरे देश में उठने लगी। हाईकोर्ट का फैसला भी लोगों के पक्ष में आया और चारों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन आरोपियों के बचाव पक्ष के वकील एपी सिंह ने चार में से एक आरोपी जो कि अपराध करने के समय 17 साल का था उसे नाबलिग बताकर उसका केस जुवेनाइल एक्ट से चलाने की दलील दी। परिणाम स्वरूप एक आरोपी को जुवेनाइल एक्ट के तहत महज तीन साल की सजा हुई। इस दौरान उसको रिफॉर्म सेंटर में रखा गया। जिसे 20 दिसंबर 2015 को रिहा कर दिया गया। आरोपी की रिहाई से नाराज पीड़ित के माता पिता ने इसे न्यायसंगत न मानते हुए एक्ट में सुधार की मांग की। परिणामस्वरूप पूरे देश में उनके पक्ष में आंदोलन खड़ा हो गया। लोगों का आक्रोश इस कदर बढा कि बिल में संशोधन की जरूरत महसूस होने लगी। इसके बाद महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने जुवेनाइल जस्टिस बिल 2014 को लोकसभा में 12 अगस्त 2014 को लोकसभा में रखा। लंबी बहस और रिसर्च के बाद लोकसभा ने 7 मई 2015 को इस बिल को पास कर दिया। इसके बाद बिल को राज्यसभा में पेश किया गया जहां 22 दिसंबर 2015 को बिल को पास कर दिया गया।

कहां चले मुकदमा?

संशोधित कानून - नाबालिग को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर 'जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड' ये जांच करे कि उसे 'बच्चा' माना जाए या 'वयस्क'। वयस्क माने जाने पर किशोर को मुकदमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाए। हालांकि चाइल्ड राइट पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि  फैसले के लिए एक महीने का समय बहुत कम है। पुलिस चार्जशीट में या अदालत के फैसले में दोष साबित हुए बगैर, किशोर को वयस्कों की जेल में रखना गलत होगा। इन लोगों का कहना है कि दुनियाभर में किए अध्ययन के मुताबिक किशोरों को कड़ी सजा देने से उनकी अपराध करने की दर में कोई कमी नहीं आती। बल्कि सुधार गृहों में बेहतर सुविधाओं से लंबे दौर में बदलाव लाया जा सकता है।  

कौन सा बच्चा माना जाएगा 'वयस्क'?

भारत समेत दुनियाभर के करीब 190 देशों ने ‘यूएन कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अंतर्गत कानूनन किसी बच्चे को 'वयस्क' मानने के लिए उम्र सीमा को 18 साल रखने की सलाह दी गई है। ऐसे में 18 साल से कम उम्र के अभियुक्त का सामान्य अदालत की जगह 'जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड' में मुकदमा चलता है। हालांकि यूएन कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स’ के बावजूद देशों को उनके हिसाब से कानून में संशोधन करने की छूट दी गई है। इसके चलते ही दुनिया के अलग-अलग देशों में इसके लिए अलग-अलग कानून हैं।

जहां अपराधी बच्चों को दी जाती है उम्रकैद

वैसे तो भारत समेत दुनियाभर के 190 देशों ने ‘यूएन कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें उम्र सीमा को 18 साल रखने की सलाह दी गई है। पर हर देश इसमें  अलग नियम बनाने को स्वतंत्र है।

बिट्रेन

 दस साल से कम उम्र में किसी भी अपराध के लिए गिरफ्तारी नहीं हैलेकिन कुछ पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। 10-17 साल कीउम्र के बच्चों पर मुकदमा जुवेनाइल कोर्ट मेंऔर दोषी पाए जाने पर विशेष सेंटर्स में भेजा जा सकता है। 18 साल की उम्र के किशोर को25 साल की उम्र तक जेल के बजाय विशेष सेंटर में भेजा जा सकता है। 10 साल की उम्र के बाद दी गई अधिकतम सजा उम्रकैद हो सकतीहै।

अमेरिका : 


यहां हर राज्य ने अपने हिसाब से बच्चों पर मुकदमा चलाने की उम्र तय की है और ये अलग-अलग राज्य में न्यूनतम 6साल से लेकर 12 साल तक है। इसी तरह हर राज्य में बच्चों पर मुकदमा चलाए जाने की अधिकतम उम्र 16 से लेकर 19 साल तक है। इस उम्र तक मुकदमा जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट में चलाकर सज़ा सुधार गृह भेजने जैसी हो सकती है। जघन्य अपराधों में नाबालिग काकेस जुवेनाइल कोर्ट से वयस्कों की अदालत में भेजने का प्रावधान है।  जहां उसे बालिग समझते हुए मुकदमा चलाया जा सकता है। कुछराज्यों में 10 साल के बच्चे को भी अधिकतम उम्रकैद की सजा हो सकती है।


पाकिस्तान 

सात साल से कम उम्र के बच्चों के खिलाफ कोई  मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। पर 1996 के एक अध्यादेश के ज़रिएरेपअवैध संबंध बनानेशराब पीने,  ड्रग्स का सेवन करनेचोरी और किसी को बदनाम करने जैसे अपराध में अब हर उम्र के व्यक्ति कोअपराधी माना जा सकता है। यहां किसी जुवेनाइल कोर्ट की स्थापना नहीं की गई है। हालांकि कुछ मौजूदा अदालतों को यह दर्जा दे दियागया है। किशोरो की चार जेलें हैंलेकिन अक्सर किशोरों को वयस्कों की जेल में ही रखा जाता है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

रंग रसिया

रंग रसिया

आज मैंने केतन मेहता की रंग रसिया फिल्म देखी। फिल्म में सुगंधा का रोल करने वाली नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थषास्त्री अर्मत्य सेन की बेटी नंदना सेन ने जिस सहजता के साथ अपने को स्वर्ग अफसरा उर्वशी के चरित्र में ढाला है वो कोई सहज कार्य नहीं है। नंदना सेन का सुगंधा कैरेक्टर वाकई कला एक्टिंग के प्रति दीवानगी है। आज के दौर में यह काफी कठिन है। 18वीं शताब्दी में भारत के महान चित्रकार राजा रवि वर्मा का कैरेक्टर प्ले करने वाले रणदीप हुड्डा ने भी कमाल का अभिनय किया है। परेष रावल का साइड किरदार गोवर्धन सेठ भी काफी अहम रोल में गिना जाना चाहिए। फिल्म में न्यूडिटी होने के बाद भी यह फिल्म लोगों को देखनी चाहिए। इस तरह की फिल्में हमें नाॅलेज देती हैं। मसलन जो इस फिल्म को देखेगा उसे आसानी से पता चल सकेगा कि मां सरस्वती, लक्ष्मी आदि तमाम देवी देवताओं के काल्पनिक चित्र कैसे और किसने कब बनाए। इसके अलावा भारत में प्रिंटिंग प्रेस कौन लाया। देश में सिनेमा को लाने वाला कौन आदि ऐसे कई सवाल जो हम किताबों में पढ़कर बतौर जनरल नाॅलेज याद करते हैं, केतन मेहता ने वो सारी चीजे फिल्म के माध्यम से मन मस्तिश्क में स्थायी रूप से बैठाने का प्रयास किया है। फिल्म में राजा रवि वर्मा का नौकर पाचन का का रोल विपिन षर्मा ने प्ले किया है। पाचन एक ऐसा नौकर है, जो दुनिया की परवाह किए बगैर अपने मालिक की सेवा में ईमानदारी से जुटा रहता है। उसे अपने मालिक राजा रवि वर्मा के प्रति पूरा विष्वास है। पाचन खुशवंत सिंह के नौकर बुधसिंह जैसा ही हैैै। हां मैं उसी बुधसिंह की बात कर रहा हूं जो अपने मालिक और भागमती के संबंधों से चिढ़ता है। इसके बाद भी वो भागमती ( हिजड़ा) को अपने मालिक लिए उसे बुलाने जाता है। (खुशवंत सिंह की किताब दिल्ली से)
रंग रसिया में न सिर्फ राजा रवि वर्मा के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है, बल्कि इसमें नारी को लेकर वो तमाम मुदृदे भी मिलते हैं जिसमें वर्षों बहस चल सकती है। राजा रवि वर्मा का उर्वशी प्रसंग और उस पर बनी सुगंधा की न्यूड तस्वीर बहस का विषय है, लेकिन इसके बाद भी सेंसर बोर्ड ने इसे पास कर बालीवुड सिनेमा के साथ न्याय किया है। मैं तो कहूंगा बालीवुड को रंग रसिया जैसी फिल्म बनाते रहना चाहिए। निर्देषक केतन मेहता ने रंग रसिया के माध्यम से आम जनमानस तक महान चित्रकार राजा रवि वर्मा को आसानी से पहुंचाने का कार्य किया है। इस फिल्म में राजा रवि वर्मा के बारे में तो अच्छी जानकारी है ही साथ ही वे न सिर्फ अपनी देवी देवताओं की चित्र बनाने के लिए मशहूर है बल्कि भारतीय सिनेमा के आधार भी है। तभी तो उन्होंने दादा साहेब फालके की आर्थिक मदद कर कला को जीवत रखा। मंगल पांडेय बनाने के बाद केतन मेहता की यह दूसरी फिल्म है जो इतिहास पर आधारित है। अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि जो इस फिल्म को गंदा या अष्लील कहते हैं उन्हें उनके लिए फिल्म में धर्मगुरू चिंतामणि का किरदार पर्याप्त है। चिंतामणि जिसने 18 हजार मंदिर का निर्माण कराने के बाद भी सुगंधा को देवी से वेष्या में बना डाला था। चिंतामणि जैसे किरदार आज भी कचहरी में वकीलों के भेश में रहते हैं। बावजूद इसके फिल्म में न्याय जिंदा रहता है। जो राजा रवि वर्मा को बा इज्जत बरी कर देता है। - धन्यवाद
समीक्षा पसंद आई तो लाइक करें अन्यथा कमेंट करें। शेखर त्रिपाठी