रविवार, 3 जनवरी 2021

खाली जमीन पर करें बांस की खेती, वन विभाग दे रहा अनुदान

  

एक हेक्टेअर पर 25 हजार रुपये का अनुदान मिलेगा


किसानों की आय दोगुनी करने के लिए वन विभाग सहभागी बनेगा। नैशनल बैम्बू मिशन योजना के तहत किसानों को प्रति हेक्टेअर बांस की खेती करने पर 25 हजार रुपये का अनुदान देगा। जिले को चालू वित्तीय वर्ष के लिए 13 हेक्टेअर क्षेत्रफल में बांस की खेती शुरु कराने का लक्ष्य मिला है। विभाग को उम्मीद है कि बांस की कटान पर कोई रोक होने से इसका व्यापार बेहतर होगा। यहां तक बांस से कई तरह के चीजों का निर्माण करने वालों को आसानी से बांस भी मिल सकेगा। जिन किसानों के पास खाली जमीन है, उस पर अगर वह बांस की खेती करना चाहे तो वन विभाग उन्हें 25 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर अनुदान देगा।  डीएफओ एसके तिवारी ने बताया कि लक्ष्य सीमित होने के कारण प्रथम आवक प्रथम पावक के आधार पर योजना में लाभार्थी चुना जाएगा। बांस की खेती अब तक बाराबंकी में नहीं होती थी। बांस की मांग बढ़ने पर शासन ने इस खेती को ढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की प्लानिंग की है।


अक्टूबर से मार्च मे करें शुरुआत

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बांस की खेती के लिए अक्टूबर से मार्च तक गड्ढा खोदने और जुलाई में रोपाई करने का उचित मौसम होता है। बाजार में 8 से 10 रुपये के अच्छी प्रजाति के पौध के उपलब्ध हैं। एक हेक्टेयर में 450 पौधे लगते हैं। जानकार बांस को खेत का खजाना कहते हैं। बांस को वन संपदा की लिस्ट से हटाकर भले ही किसानी का दर्जा दिया गया हो, लेकिन इस खेती का क्रियान्वयन वन विभाग से अब भी हो रहा है। जहां पर सरकारी नर्सरी में बांस के पौधे होते हैं, वहां पर किसानों को नि:शुल्क पौध उपलब्ध कराए जाते हैं। बांस की खेती से चार साल बाद मुनाफा शुरू हो जाता है। इससे पूर्व किसान बांस के कल्ले बिक्री कर लागत निकाल सकते हैं। एक एकड़ में 25 से 30 हजार रुपये के कल्ले बिक्री होते हैं। हरा सोना के नाम से बांस की खेती की पहचान होती है। सीतापुर में किसान ज्यादा खेती करते हैं। बंजर भूमि पर बांस की खेती करने से धीरे धीरे बंजर भी दूर होता है।


एक दिन में एक मीटर तक होती है वृद्धि

बांस के पौधे अन्य फसलों की तरह नही होते है। इसके कल्ले से जो भूमिगत तना निकलता है वह बड़ी तेजी से बढ़ता है और किसी-किसी किस्म की बढ़वार एक दिन में एक मीटर तक की होती है। बांस दो माह में अपना पूरा विकास कर लेता है। बांस के अच्छे बढ़वार के लिए बारिश में इसके कल्लों के बगल में मिट्टी चढ़ाकर जड़ों को ढक देना चाहिए। बांस की कटाई उसके होने वाले उपयोग पर निर्भर करता है अगर बांस की टोकरी बनानी है तो वह 3- वर्ष पुरानी फसल हो, अगर मजबूती के लिए बांस की आवश्यकता है तो 6 वर्ष की फसल ज्यादा उपयुक्त होती है। बांस की कटाई का उपयुक्त समय अक्टूबर के दूसरे सप्ताह से दिसम्बर माह तक का होता है। गर्मी के मौसम में बांस की कटाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे जड़ें सूख सकती है और कल्ले फूटने की कम संभावनाएं होती है। बांस का उपयोग सौदर्य प्रसाधन, बड़े बड़े होटलो में फर्नीचर, टिम्बर मर्चेंट से लेकर सस्कृति कार्यों तक में होता है। बांस के औषधीय गुण भी है। इसका मुरब्बा, अचार आदि भी बनाया जाता है। बांस की डलिया पूजा के काम आती हैं। पौधों की बैरीकेंडिंग से लेकर छप्पर निर्माण, टमाटर की खेती में बहुतायत होता है।

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

सीढ़ियों में ग्रेनाइट/ मार्बल/ टाइल्स क्या लगवाना ठीक है

 


दोस्तों अक्सर जब हम घर पर जीने अथवा सीढ़ियों को बनवाते हैं तो उस पर मार्बल लगाया जाए अथवा ग्रेनाइट या फिर टाइल्स लगाने को लेकर कन्फ्यूज हो जाते हैं। तो आज के इस विडियो में मैं आपके इस कन्फ्यूजन को हमेशा के लिए खत्म कर दूंगा। पहले बात करते हैं टाइल्स पर। इसमें कोई शक नहीं कि आज हैवी ड्यूटी टाइल्स मार्केट में उपलब्ध है, यह टाइल्स लगाई भी खूब जा रही है, लेकिन दोस्तों जीने में हो सके तो इसे लगवाने से बचें। क्योंकि टाइल्स सरफेस और वॉल के लिए तो ठीक है, लेकिन जीने के लिए नहीं। क्योंकि जीने से भारी सामान का आना जाना भी होता है। सीढ़ियों पर चढ़ते उतरते समय हमारे पैर सीढ़ियों के किनारों पर ज्यादा पड़ते हैं ऐसे में टाइल्स निकलने अथवा टूटने का खतरा बना रहता है। किरायेदार के आने और जाने में उसके घर का हैवी सामान भी जीने के माध्यम से ही चढ़ता उतरता है। ऐसे में जीने का मजबूत होना बहुत जरूरी हो जाता है।

 तो दोस्तों दूसरे नंबर पर आता है मार्बल। मार्बल की सरफेस स्मूथ होती है। यह आंखों को स्मूथनेस का एहसास करवाता है। जहां भी लगेगा सरफेस को कूल भी रखता है।  अब तक तो मार्बल का प्रयोग सीढ़ियों के लिए खूब होता था। लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है। उसकी सबसे बड़ी वजह है कि मार्बल समय के साथ पीला पड़ता है, और उसमें नींबू का रस, खटाई आदि के गिरने के दाग भी पड़ जाते हैं। हालांकि ऐसा जल्दी नहीं होता , लेकिन एक टाइम बाद उसके सरफेस में गंदगी का एहसास होने लगता है। ऐसे में हमें मार्बल को आठ से दस साल में पॉलिश करवाना ही पड़ेगा। पॉलिश का खर्च भी पत्थर की खरीद के करीब करीब बराबर ही होता है। उत्तरप्रदेश में कानपुर में सबसे बड़ी पत्थर मंडी आलूमंडी में है। मार्बल की शुरूआत 30 से 80 रुपये वर्गफुट तक होती है। जबकि पॉलिश का खर्च 30 से 60 रुपये तक आता है। ऐसे में ओवरआल मार्बल का खर्च भी 85 रुपये वर्गफुट का औसत आता है। इसलिए अगर बजट कम हो और सीढ़ियों का प्रयोग सिर्फ घरेलू हो तो मार्बल को बुरा नहीं कहा जा सकता है। 

तीसरे नंबर पर आता है ग्रेनाइट। ग्रेनाइट का सरफेस काफी हार्ड होता है। क्योंकि यह नैचुरल चट्टान होती है। चट्टान को मशीन से काटने के बाद उसमें एक साइड मशीन से ही पॉलिश करके इसे तैयार किया जाता है। किचन टॉप पर ग्रेनाइट ही सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है। ग्रेनाइट की चमक सबसे ज्यादा होती है। ऐसा में इसमें एलुमिनियम और लोहे के मौजूद होने से होता है। मार्बल की तुलना में ग्रेनाइट चीजों को कम ऑब्जर्व करता है। मतलब अगर आप नींबू के रस को मार्बल पर डालेंगे और फिर उसे पोछेंगे तो इसमें हल्का खुरखुरापन आएगा, क्योंकि यह नींबू के रस को ऑर्ब्जव करता है। जबकि ग्रेनाइट में कुछ भी डालें और फिर उसे कपड़े से पोछ दें तो उसमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मार्बल की तुलना में ग्रेनाइट की लाइफ भी चार गुनी होती है। ग्रेनाइट सबसे बेस्ट है। आजकल इसको सीढ़ियों में लगाने का चलन काफी बढ़ा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि इसको लगाने के बाद पॉलिश का झंझट नहीं होता है। क्योंकि इसका सरफेस मशीन से पॉलिश किया हुआ मिलता है। इसके अलावा ग्रेनाइट मजबूती में भी मार्बल से ज्यादा होता है। ग्रेनाइट की शुरूआत 60 रुपये वर्गफुट से लेकर 1000 रुपये तक होती है। आजकल बाहर के देशों से भी ग्रेनाइट इंपोर्ट होता है। देश में राजस्थान से ग्रेनाइट मिलता है, जबकि ब्लैक ग्रेनाइट साउथ का अच्छा माना जाता है। शॉपिंग मॉल्स आदि में ग्रेनाइट की ही सीढ़ियां होती है। हालांकि इसका एक ड्रा बैक था कि चिकना होने से इसमें स्लिप करने के चांस होते हैं, लेकिन अब ग्रेनाइट में ग्रुप काटकर इसे एंटी स्किड किया जा सकता है। कहने का अर्थ है कि अगर बजट ठीक हो तो ग्रेनाइट ही जीने में लगाना चाहिए। क्योंकि पॉलिश खर्च मिलाकर करीब करीब बराबर ही खर्च आता है। 


अब बात कर लेते हैं कोटा पत्थर की

मजबूती के लिहाज से यह सर्वोत्तम है। लेकिन मजबूती और सुंदरता के लिहाज से ग्रेनाइट ही आगे है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म और उसकी सीढ़ियों में अक्सर कोटा पथर ही लगाया जाता है। हालांकि स्टेशन के बाहर की सीढ़ियों को बेहतर लुक देने के लिए ग्रेनाइट ही लगाया जाता है। बजट में यह सबसे कम में लगता है। इसमें भी पॉलिश की जरूरत होगी। इसकी चमक मार्बल और ग्रेनाइट से काफी कम होगी।


ग्रीन ग्रेनाइट क्यों न लगाएं

ग्रीन ग्रेनाइट सबसे सुंदर पत्थर है। लुक के लिहाज से यह काफी बेहतर है। लेकिन मजबूती के लिहाज से ग्रेनाइट की श्रेणी में सबसे कमजोर है। हालांकि इसकी मोटाई के हिसाब से इसकी मजबूती बढ़ जाती है। वर्तमान में ग्रीन ग्रेनाइट में ग्राउंटिंग कर टूट चुकी स्लैब को जोड़ दिया जाता है। ग्रीन होने से यह दरार आसानी से छिप जाती है। हालांकि सीढ़ियों के लिए इसे भी बेहतर विकल्प माना जाता है। 




शनिवार, 25 जुलाई 2020

कानपुर में घूमने के 10 बेहतरीन स्थान




नंबर वन पर है एलेन फारेस्ट चिड़िया घर। 



 यह चिड़ियाघर क्षेत्रफल (77 हेक्टेअर) की दृष्टि से भारत के सर्वोत्तम चिड़ियाघर में गिना जाता है। वर्तमान में यहां पर करीब 1200 जीव जंतु हैं। पिकनिक और जीव जंतुओं को देखने के लिए यह एक बेहतरीन स्थान है। 4 फरवरी 1974 से यह चिड़ियाघर पब्लिक के लिए खोला गया था। ब्रिटिश इंडियन सिविल सर्विस के सदस्य सर एलेन यहां पर फैले प्राकृतिक जंगलों में यह चिड़ियाघर खोलना चाहते थे। पर ब्रिटिश काल में उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। जब भारत सरकार द्वारा 1971 में यह चिड़ियाघर खोला गया तो उन्हीं के नाम पर इसका नाम रखा गया। इसके निर्माण में दो साल लगे थे। यहां का पहला जानवर घड़ियाल था। जो चंबल घाटी से लाया गया था। हालांकि इस जू की जान कहा जाने वाला और सबसे पुराना जानवर चिंपाजी छज्जू की 2019 में मौत हो जाने से अब यह काफी सूना लगता है, लेकिन अभी भी कई जानवर यहां हैं। इस चिड़ियाघर की सबसे खास चीज है यहां की वनस्पति। यहां आज भी कई दुर्लभ वनस्पतियां मौजूद है। जू में एक प्राकृतिक झील भी है। रात्रिचर जीव गृह भी इसमें है। यहां रात में देखे जाने वाले जीवों को रखा गया है। वर्ष 2014 से जू घूमाने के लिए जू में ट्रॉम ट्रेन मौजूद है। इसके अलावा मछली घर भी आकर्षण का केंद्र है।  जू के अंदर ही जानवरों का अस्पताल भी है। 2019 से जू में पॉलिथिन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसलिए अगर आपके पास पॉलिथीन में कोई सामान है, तो उसे जू के बाहर ही काउंटर में जमा करवाकर अंदर जा सकते हैं।
नोट : मंडे को यह जू पब्लिक के लिए बंद रहता है। अगर आप मन बना रहे हैं तो इसकी ऑफिशियल वेबसाइट www.kanpurzoo.org पर विजिट कर ऑनलाइन टिकट भी ले सकते हैं।   

कैसे पहुंचेंगे : कानपुर स्टेशन और बस अड्डे से से आपको रावतपुर के लिए ऑटो-टेंपो और बस मिलेंगी। रावतपुर से चिड़ियाघर के लिए सीधे ऑटो टैंपो मिल जाते हैं। आप ओला ऊबर भी सीधे बुक कर सकते हैं। कानपुर स्टेशन से इसकी दूरी करीब 15 किलोमीटर है। 

इस्कॉन मंदिर 


इस्कॉन मंदिर को राधा माधव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। विश्व प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर को परिचय की जरूरत नहीं है। कानपुर में यह मंदिर मैनावती मार्ग बिठूर रोड पर है। 
बहुम कम लोगों को पता है कि इस्कॉन का पहला मंदिर भारत नहीं बल्कि न्यूयॉर्क में बना था। और उसका निर्माण एक अंग्रेज द्वारा किया गया था। अगर आप कृष्ण की भक्ति का भाव रखते हैं तो आप इस मंदिर में आ सकते हैं। मंदिर में आपको बहुत शांति मिलेगी।
कैसे पहुंचेंगे : कानपुर स्टेशन से आपको कल्याणपुर के लिए सीधे टैंपो और ऑटो मिलेंगे। 2021 से इस रूट पर मेट्रो में भी मिलेगी। आपको कल्याणपुर आईआईटी गेट से मंदिर के लिए टैंपो मिलेंगे। कानपुर स्टेशन से मंदिर की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। 

ब्लू वर्ल्ड थीम वाटर पॉर्क

3. ब्लू वर्ल्ड थीम वाटर पॉर्क। यह पार्क कानपुर में बिठूर मंधना रोड में स्थित है। इसकी फुल टिकट अब तक 770 रुपये प्रति व्यक्ति है। इसमें कई तरह के झूले हैं। झूलों की संख्या इतनी ज्यादा है कि पूरा दिन भी घूमने के लिए कम पड़ सकता है। इसलिए यहां आठ बजे सुबह से एंट्री होना शुरू हो जाता है।  ब्लू वर्ल्ड कॉरपोरेशन प्राइवेट द्वारा स्थापित ब्लू वर्ल्ड सबसे बड़ा थीम पार्क है। यह पार्क 25 एकड़ में फैला है। इस पार्क में देश का सबसे बड़ा संगीत फौव्वरा डांस शो भी है। इस पार्क में और ज्यादा फन के लिए दिनों दिन नई चीजें जोड़ी जा रही है। मसलन जल्द ही इसमें डार्क जोन शुरू होने वाला है। इसमें बच्चों को काफी मजा आएगा। इसके अलावा यहां एक माल भी बनाया जाएगा। साथ ही भारत दर्शन के लिए एक थिएटर पूर्व में ही मौजूद है। इसके अलावा सेवन डी थिएटर भी खास है। इसमें इनडोर गेम प्लाजा, डायनासोर पार्क, सांस्कृतिक थिएटर, संग्रहालय है।

कैसे पहुंचे : कानपुर स्टेशन से इसकी दूरी करीब 22 किलोमीटर है। यहां आने के लिए कल्यानपुर आना होगा। स्टेशन से कल्यानपुर तक टैंपो मिलेंगे। कल्यानपुर से मंधना के लिए दूसरे टैंपो मिलेंगे। हालांकि अच्छा होगा कि कल्यानपुर से बिठूर के लिए ऑटो बुक कर लें। ताकि आप बिठूर के अन्य फेमस स्थानों को भी घूम सके।

जेके मंदिर


4. जेके मंदिर। यह मंदिर कानपुर के लाजपत नगर में है। इसका निर्माण जेके ट्रस्ट ने करवाया है। मंदिर में प्रवेश नि:शुल्क है। मंदिर की स्थापत्यकला और साफ सफाई इसका खास आकर्षण है। कानपुर में विवाह बंधन से पूर्व लड़की दिखाने के लिए यह उपयुक्त स्थान है। यह मंदिर राधाकृष्ण का है।
कैसे पहुंचे : कानपुर सेंट्रल स्टेशन से फजलगंज आएं। यहां से जेके मंदिर जाने के लिए सीधे टैंपो मिलेंगे। मंदिर के अंदर कैमरा नहीं ले जा सकते है। हालांकि बाहरी परिदृश्य को मोबाइल से कैद किया जा सकता है। 




मंगलवार, 2 जून 2020

Remove China Apps वायरल, 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड

Remove China Apps वायरल, 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड




चीनी ऐप्स को ऐंड्रॉयड फोन में पहचानने और डिलीट करने का दावा करने वाले ऐंड्रॉयड ऐप Remove China Apps देश में वायरल हो गया है। फिलहाल यह ऐप गूगल प्ले के टॉप फ्री ऐप्स की लिस्ट में अपनी जगह बना चुका है और अभी तक 50 लाख से ज्यादा बार इसे डाउनलोड किया जा चुका है। 17 मई से अब तक 50 लाख डाउनलोड का यह आंकड़ा इस ऐप की लोकप्रियता दिखाता है। कोरोना वायरस महामारी और भारत-चीन बॉर्डर पर विवाद जैसे कई कारणों के चलते देशभर में चीन के खिलाफ रोष है।



Remove China Apps क्या है?
Remove China Apps के डिवेलपर्स का दावा है कि ऐप को ऐजुकेशनल पर्पज के लिए डिवेलर किया गया है। यह ऐंड्रॉयड फोन यूजर्स को उनके फोन में इंस्टॉल ऐप्स के ओरिजिन देश को पहचानने में मदद करता है। हालांकि, जैसा कि नाम से पता चलता है यह सिर्फ चीनी कंपनियों द्वारा डिवेलप किए गए ऐप्स को पहचानने में मदद करता है और यूजर्स चाहें तो 'Remove China Apps के जरिए चीनी ऐप्स को अनइंस्टॉल कर सकते हैं। 

गौर करने वाली बात है कि 17 मई को गूगल प्ले पर लाइव होने वाले इस ऐप को अभी तक 50 लाख से ज्यादा यूजर्स डाउनलोड कर चुके हैं। गूगल प्ले पर इस ऐप को 4.9 रेटिंग के साथ अधिकतर पॉजिटिव रिव्यूज मिले हैं। इस ऐप को OneTouch AppLabs ने बनाया है। इसका दावा है कि यह जयपुर की कंपनी है और इसकी डोमेन ओनर साइट Whois के अनुसार इसकी वेबसाइट 8 मई को बनाई गई। यह ऐप गूगल प्ले स्टोर पर डाउनलोड करने के लिए मुफ्त उपलब्ध है। खास बात है कि ऐप को इस्तेमाल करने के लिए लॉगइन की जरूरत नहीं होती और यूजर्स अपने ऐंड्रॉयड फोन में चीनी ऐप्स को पहचानने के लिए Scan का विकल्प चुन सकते हैं।


अपने फोन से चीनी ऐप्स को ऐसे करें डिलीट
गूगल प्ले स्टोर से 'Remove China Apps' डाउन